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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९

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अकीर्त्ति—अकीलिस
पत्थरको बनी हुई अनेक चीज़ें क्रय करके ले जाते थे। हिन्दू लोग इस पत्थरकी ऐसी-ऐसी उत्कृष्ट चीज़ें बनाते थे, कि केवल उनके कौशलके कारण एक-एक चीज़ लाख-लाख रुपयेमें बिकती थी। रोमके प्रसिद्ध राजा नेरोने इसी पत्थरकी बनी हुई एक सामान्य कटोरी ६६१५०००) रुपयेकी क्रय की थी। आजकल भी अफ़्रीकाकी बहुतसी चीज़ें प्रति वर्ष चीन, अरब, काबुल और युरोप, भेजी जाती हैं। एक दर्जन बोतामका मोल ६) रुपया, एक काग़ज़ काटनेकी छुरीका दाम १॥) रुपया होता है।
अकीर्त्ति (सं॰ स्त्री॰) न-कृ-क्तिन्। अयश, अपयश, बदनामी। कृत चुरादिगणीय, संशब्दने। इस धातुकी उपधामें दीर्घ ऋकार होगा, ह्रस्व नहीं। १७५० शकमें कलकत्ताकी एडुकेशन कमिटी-कर्तृक जो भट्टिकाव्य छपा था, उसमें जयमङ्गल और भरत मल्लिककी टीकामें भी ह्रस्वोपध कृत धातु देखी जाती है। जैसे—
अपप्रथद् गुणान् भ्रातुरचिकीर्त्तच्च विक्रमम्। (भट्ठि १५।७२) कृत संशब्दे (इति भं में और जं में टीका)
किन्तु पाणिनि, भट्टोजिदीक्षित, वामनजयादित्य, क्रमदीश्वर, दुर्गसिंह और दुर्गादास प्रभृति सुधीगणने कृत धातु दीर्घोपध ही ग्रहण की है। श्रीयुक्त राधा-नाथशीलके प्रकाशित मुग्धबोधमें दीर्घ ऋकार है। सिद्धान्तकौमुदीमें पाणिनिका सूत्र उद्‌धृत करके इस प्रकार लिखा गया है—कृत संशब्दने।*। उपधायाश्च। पा ७।१।१०१। धातोरुपधाभूतस्य ऋत इत्स्यात्। रपरत्वम्। उपधायाञ्चेति दीर्घः। धातुका उपधाभूत दीर्घ ऋकार इत् होता है। उसका र् और उपधामें दीर्घ ईकार होता है। यथा—कृत लट् कीर्त्तयति। लुङ् अचीकीर्त्तंत्, अचीकृतत्। किन्तु कोई प्रत्ययादि प्रयोग करनेसे दीर्घोपध धातु भी स्थानिवत् ह्रस्व हो सकती है। "तपरकरणं दीर्घे पिस्थानिनि ह्रस्व एव यथा स्यात्" इति काशिका। यथा, अचीकृतत्। अतएव प्रत्ययादिका प्रयोग न होनेसे उपदिष्टमूल धातु प्रकृतावस्थामें ग्रहण करना चाहिये।
अकीर्त्तिकर (सं॰ त्रि॰) अयशस्कर। बदनाम करनेवाला।

अकीलिस (Achilles)—प्राचीन मिश्रके एक प्रसिद्ध योद्धा और महाकवि होमरके बनाये इलियद नामक महाकाव्यके अन्यतम प्रधान नायक।
कहते हैं, कि वह फ़थिया देशके राजा पेलेउसके पुत्र थे और उनकी माताका नाम थेटिस था। थेटिस एक जलदेवी थीं। यूनानकी कहानियोंमें यह कहा जाता है, कि अकीलिसके दादा इयेकस देवता जेउसके लड़के थे। अकीलिसके लड़कपनके सम्बन्धमें होमरने जो लिखा है, उसके साथ पीछेके जीवनी-लेखकोंका सामञ्जस्य नहीं देख पड़ता। होमरने लिखा है,—वह लड़कपनमें अपनी माताके पास फथिएमें रह पाले-पोषे गये थे। उस समय वह काइरनके पास युद्धविद्या, बोलचाल, गानाबजाना और दवा करना सीखे थे। ट्रयके विरुद्ध लड़ाईका डङ्गा बजनेपर वह अपने नौकर-चाकरोंके साथ पचास जहाज ले युद्ध करनेको रवाना हुए।
अकीलिसके बाल्य-जीवन-सम्बन्धपर कितनीही अनोखी-अनोखी कहानियाँ कही जाती हैं। अकीलिसकी माता अमर करनेके उद्देश्यसे शिशु अकौलिसके सब अङ्गोंमें रोज अमृत लगा रातको उन्हें जलती आगके कुण्डमें डाल देती थीं। एक बार उनके पिताने यह लोमहर्षण घटना देख अग्निकुण्डसे शिशुको निकाल लिया। इससे थेटिस बहुत नाराज हो समुद्रमें कूद पड़ीं। दूसरी कहानी इसतरह बताई जाती है, कि उनकी माता उन्हें ष्टीक्स नदीके जलमें डुबाती थीं। ऐसा करनेसे अकोलिसका सर्व्वाङ्ग लोह जैसा कड़ा हो गया, किन्तु उनको एड़ी जैसीकी तैसीही बनी रही। कारण, थेटिस उसीको पकड़ उन्हें डुबकी देती थीं‌।
इसके बाद बालक शिक्षा पानेके लिये काइरनको सौंपे गये; काइरन उन्हें बलवान् और क्षमताशाली बनानेके लिये सिंहकी आंत, भालूकी चर्बी, और जङ्गली सूअरका मांस खिलाते थे।
ट्र्यकी युद्धयात्रा रोकनेके लिये थेटिसने अकीलिसको बालिकाकी वेशभूषासे सजा राजा लाइकोमेरिसकी सभावाली कुमारियोंके बीच छिपा रखा था। ओडीसिअसने खोञ्चेवालेका रूप बना और इस राज-