सभामें पहुँच अपनी बेचनेकी चीज़ें दिखाईं। इन चीज़ोंमें एक बर्छा और एक ढाल भी थी। सभामें बैठीं बालिकायें जिस समय चीज़ें आदि देखनेमें लगी थीं, उसी समय ओडीसिअसने एक भयानक शब्द उच्चारण किया। यह भयानक शब्द सुन बालिकायें डरसे भाग खड़ी हुईं, किन्तु अकीलिस निर्भय भावसे वहीं डटे रहे और दिखाये जानेवाला वह बर्छा और ढाल उठा ली। इसतरह ओडीसिअसके सामने आत्मप्रकाश करनेसे अकीलिस अनुरुद्ध हो दूसरे यूनानी वीरोंके साथ युद्धयात्रा करनेपर वाध्य हुए थे। इलियदमें ऐसा लिखा है, कि ट्रय-युद्धके पहले वर्षोंमें ट्रयके पासवाले कितने ही नगरोंको अकीलिसने उजाड़ डाला और बारह शहरोंपर अधिकार कर लिया था। दसवें वर्ष अगामेसननके साथ झगड़ा शुरू हुआ। अपोलोकी कोपट्टष्टिमें सिपाहियोंमें महामारी फैली। अपोलोका कोप ठण्डा करनेके लिये अगामेंमननने वन्दिनी क्राइसेइसको उसके पिता, अपोलोके पुरोहितको सौंप दिया। किन्तु अकीलिसको अनुरक्त गुलाम ब्रीसेइसको ऊन्हें न सौंपा। इससे अकीलिस क्रुद्ध हो अपने डेरे वापस आये और भविष्यत्में फिर युद्धपर जाना अस्वीकृत कर गाने-बजानेमें मन लगा समय बिताने लगे। उनकी अनुपस्थितिके कारण यूनानी सिपाहियोंकी फौज मारी जाने लगी। यूनानियोंकी ऐसी दुरवस्था देख अकीलिस कुछ होशमें आये और अपना कवच और रथ देकर अपने बन्धु पेट्रोक्लसको लड़ाईपर भेजा। इसके बाद पेट्रोक्लसके ट्रोजन-वीर हेक्टर द्वारा मारे जानेपर अकीलिसका निरुत्साह भाव पूरे तौरपर मिट गया, वह उत्तेजित हुये और फिर नये उत्साहसे लड़ने चले। पीछे इस युद्धमें अकीलिसने हेक्टरका वध कर अपने प्यारे बन्धुके मारे जानेका बदला लिया था। हेक्टरकी अन्त्येष्टिक्रिया वर्णनकर होमरने इलिअद काव्य समाप्त किया है। अकीलिसकी मृत्यु इलिअदमें नहीं लिखी। दूसरी पुस्तकोंमें ऐसा लिखा है, कि मेमनन और अमेजनकी हत्या करनेसे अकीलिस पेरिसके हाथ मारे गये। अपोलो द्वारा
सुझाये गये और भेजे हुए पेरिसने अकीलिसके पैरकी एड़ीमें वाण मारा था, इसीसे उनकी मृत्यु हुई।
अकुण्ठ (सं॰ त्रि॰) जो गुठला न हो, तेज़। कार्य्यदक्ष। प्रतिभायुक्त। प्रतिबन्धशून्य।
अकुटिल (सं॰ त्रि॰) जो कुटिल न हो। सीधा।सरल। भोला। सीधा-सादा। निष्कपट।
अकुटिलता (स॰ स्त्री॰) सादापन। सीधापन सिधाई।
अकुताना (हिं॰ क्रि॰) उकताना देखी।
अकुतोभय (मं॰ त्रि॰) न-किम्-तमिल्-भय। नास्ति कुतोपि भयं यस्य। मयू॰तत्। निर्भय। जिसे किसीका भय न हो। अकिञ्जन देखी।
अकुप्य (सं॰ क्ली॰) न कुप्य, नञ्-तत्। स्वर्ण। रुप्य। न-गुप-क्यप्।*। राजसूयसूर्य्यामृपोद्यरुप्य कुप्यकृष्टपच्याव्यथाः। पा ३।१।११४। एते सप्तक्यवन्ता निपात्यन्ते। गुपेरादेः कुत्वञ्च संज्ञायाम्। सुवर्णरजत-भिन्नं धनं कुप्यम्, गोप्यमन्यत्। (भट्टजिदीक्षित) राजसूय-सूर्य्य-मृषोद्य रुप्य कुप्य कृष्टपच्य-अव्यय, यही सात क्यप् प्रत्ययान्त शब्द निपातनसे भिन्न हुए हैं। गप धातुका गकार ककार हो गया है। स्वर्ण और रजत भिन्न धन लेनेसे कुप्य होगा, नहीं तो गुप्य।
अकुमार (सं॰ त्रि॰) न-कुमार। न कुत्सितः अल्पो मारो यस्य। जिसकी कुमारावस्था अतीत हो चुकी हो। युवा। बालिग़। अकुमार अर्थात्, नाबालिक़ नहीं।
अकुल (सं॰ त्रि॰) न-कुलं नास्ति कुलं यस्य। नञ्-तत्। बहुव्री॰। १ असद्वंश। २ जिसका कुल न हो। कुलरहित। ३ परिवारविहीन। (पृ॰) ४ शिव। निर्गुण निलज कुवंश कपाली। अकुल अगेह दिगम्बर व्याली॥ (तुलसी) तल् स्त्रियां टाप्—अकुलता, नीचवंशका भाव। "कुलान्वनुकुलतां यान्ति।" (मनु ३।६३)