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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४१

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अकुलाना—अकृतध्न
अकुलाना (हि॰ क्रि॰) घबड़ाना। शीघ्रता करना। ऊबना।
अतिशय देखि धर्म्मकी हानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥ (तुलसी)

इन दुखिया अखियानको मुख सिर जोई नाहिं।
देखत बने न देखते बिन देखे अकुलाहिं॥ (बिहारी)

अकुलि (सं॰ पु॰) असुरोंके एक पुरोहितका नाम। शतपथब्राह्मणमें अकुलि-सम्बन्धी एक गल्प है।—मनुका एक बैल था, जिसका गर्ज्जन सुनते ही असुर और राक्षस प्राण त्याग करते थे। दैत्यगुरु किलात एवम् अकुलिने देखा कि, अब और किसीतरह निस्तार नहीं है। इस बैलकी शीघ्र ही वध करना चाहिये। यह बात निश्चय कर वह मनुसे बोले—आपकी पूजाके लिये हम कुछ बलि देना चाहते हैं। मनु सम्मत हो गये। असुरोंने उसी वृषभको लाकर बलि दिया। वृषभ तो मर गया; परन्तु असुरवंशके विनाशका कालगर्ज्जन न मिटा; वह मनुपत्नी मनायीकी देहमें प्रविष्ट हो गया। मनायीके बात करते ही असुर लोग मरने लगे। दूसरी बार किलात और अकुलिने मनायीको बलि देना चाहा। मनुने यह बात भी मान ली। किन्तु वह गर्जन गया नहीं, इस बार वह यज्ञ और यज्ञपात्रमें प्रवेश कर गया। (शतपथ-ब्राह्मण १।४।१४।)
अकुलिनी (हि॰ वि॰) (सं॰ अकुलीना) जो कुलवती न हो। कुलटा। व्यभिचारिणी।
अकुलीन (सं॰ त्रि॰) नीच कुलका, कमीना, क्षुद्र। तुच्छ वंशमें उत्पन्न। बुरे कुलका। अभद्र।
अकुशल (सं॰ पु॰) अमङ्गल। अशुभ। बुराई। अहित। (त्रि॰) जो चतुर या दक्ष न हो। अनिपुण। अनाड़ी। अधकच्चड़।
अकुशलधर्म्म (सं॰ पु॰) बौद्ध धर्म्मानुसार प्राणियोंका पाप करनेका स्वभाव। धर्म्म न जाननेवाला।
अकूत (हिं॰ वि॰) जो कूता न जा सके। जिसकी गिनती तौल या नाप वा परिमाण न बतलाया जा सके। बेअन्दाज़। अपरिमित। अगणित।
औधपुर विलासी औ योगिन मन बासीके हेतु जिन कीन्ही परिचरिया अकूतकी। (कवीन्द्र)
अकूपार (सं॰ पु॰) न-कूप-ऋ-अण्। न कूपं ऋच्छति।

कच्छप, कछुआ। न कुत्सितः अल्पः पारः, न-कु-पृ-अण। (कू दीर्घ) जिसका पार अल्प नहीं। महापारावार। समुद्र। पर्व्वत। सूर्य्य। पत्थर या चट्टान।*। वह कच्छप जिसके पीठपर शेष और शेषके फणपर पृथ्वी मानी जाती है। यथा—
नीचे बहै बार तापै बैठो बड़ अकूपार वाहिऔकी पीठपर सवार शेष कारा है।—(ग्वान्त)
अकूर्च्च (सं॰ त्रि॰) न-कुर-चट् निपातनात् दीर्घः। नास्तिः कूर्च्चः कैतवो यस्य। अकैतव। ऋजु‌। श्मश्रुशून्य। मकना। जिसके मूँछें न हों। (पु॰) बुद्ध।
अकूलपाथार (हिं॰ पुं॰) पाथस् जल, महासागर। पारावार। समुद्र।
अकूहल (हि॰ वि॰) बहुत। अधिक। असंख्य। (केवल छन्दमें प्रयुक्त होता है)। यथा—
खेलत हँसत करें कौतूहल। जुरे लोग जहँ तहाँ अकूहल। (सूर)
अकृच्छ्र (सं॰ पु॰) क्लेशका अभाव। आसानी। सुगमता। असङ्कोच। (त्रि॰) क्लेशशून्य। जिसे किसी प्रकारका क्लेश, सङ्कोच या कष्ट न हो। दुष्करका उलटा। आसान। सुगम।
अकृत (सं॰ क्ली॰) न-कृ-क्त-भावे। १ बिना किया हुआ। असम्पादित। २ अन्यथा किया हुआ। बिगाड़ा हुआ। अंड-बंड किया हुआ। ३ न प्रशस्तकाले यत् कृतं, अकार्य्य। ४ न कृत्, नं-तत्। असम्पन्न। अकृतापराध—जो अपराध न किया गया हो। ५ जो किसी का बनाया न हो। नित्य। स्वयंभू। प्राकृतिक। निकम्मा। बेकार। मन्द। स्वभाव। प्रकृति।

नाहीं मोरे और कोउ, बलि, चरनकमल बिनु ठाउँ।
हौं असोच अक्कृत अपराधी, सन्मुख होत लजाउँ॥ (सूर)

अकृतकाल (सं॰ त्रि॰) जिसके लिये कोई काल नियत न हो। जिसके सम्बन्धमें कोई समय न निर्दिष्ट किया गया हो।
अकृतघ्न (सं॰ त्रि॰) न-कृत-हन-क। कृतज्ञ। उपकार माननेवाला। (स्त्री॰) अकृतघ्नता।
ग्रलम्बघ्न, शत्रुघ्न, कृतघ्न इत्यादि शब्द क प्रत्यय द्वारा सिद्ध होते हैं। किन्तु जायाघ्न, पतिघ्नी, पित्तध्न, वातध्न इत्यादि शब्द क प्रत्यय द्वारा सिद्ध नहीं होते। यह