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७४९ ई॰ में वंशराजने इस नगरको संस्थापन किया था। वंशराजके पिताका नाम यशोराज था; यह सौराष्ट्रके राजा रहे। इनकी माता सुन्दररूपा कहाती थीं। कहते हैं, कि सौराष्ट्र नृपति अतिशय दुर्वत्त रहे। समुद्रमें बाणिज्य-पोतोंको यातायात मचाते देख वह सब नौका लूट लेते थे। इसी कारण समुद्र उछलकर देववन्दर नामक उनको राजधानी खा गया। उसी जलप्लावनमें नगरके सब लोगोंने अपने-अपने प्राण त्याग किये। उस समय यशोराजकी पत्नी सुन्दररूपा पूर्णगर्भा थीं। उन्होंने अति कष्टसे निकटवर्ती किसी अरण्यके मध्य में पलायन किया। उसी जगह वंशराजका जन्म हुवा था। शैलग सुराचार्य नामक किसी जैनने शैशवावस्थामें उनकी रक्षा की थी, इसीलिये उन्होंने जैनधर्मको अवलम्बन कर लिया था। उसके पीछे कुछ वयस्प्राप्त हो वंशराजने अनल बाड़ नगरको स्थापन किया। जान पड़ता है, कि कुमारपालचरितमें इसी नगरका नाम उल्लिखित है। १०६४ शकाब्दमें महमूदने वल्लभसेनको यहांका राजा बनाया था। पाटन देखो। अनलविवर्धनी (सं॰ स्त्री॰) कर्कटिका, ककड़ी।
अनलशिला (सं॰ स्त्री॰) अग्निप्रस्तर, आगका पत्थर (Aerolites, Fireballs, Shooting stars ) आकाशसे कभी-कभी जो अग्निमय प्रस्तर खण्ड गिरता, उसीको अनलशिला कहते हैं। यह अग्निदृष्टि उल्कापातसे विभिन्न है। दिनको ऐसी अग्निवृष्टि पड़नेसे पहले आकाशका एकस्थान निविड़ काले मेघसे आच्छन्न हो जाता है। उसके पीछे भयङ्कर वज्रपात-जैसा शब्द फूट पड़ता है। रातको इसी प्रकार उत्पात उठनेसे स्पष्ट प्रकाश देखने में आता है। शून्यमें प्रज्वलित गोले-जैसे पत्थर पड़ा करते हैं। पीछे वही पत्थर फटते हैं, जिनसे भयङ्कर शब्द निकलता है। दिनके समय अनलशिला बरसनेसे पहले आकाशमें जो काला मेघ आता है, वास्तविक रूपसे वह मेघ नहीं होता। अग्निशिलास जो धुवां निकला करता, वही मेघ-जैसा देख पड़ता है। रात्रिकाल हो जानसे इस आगकी रोशनी भभकने लगती है।
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थोड़ी रहनेपर सूर्यके किरणमें आग प्रकाशित नहीं पड़ती। किन्तु जब अधिक अग्निवृष्टि होती, तब नभोमण्डल इतना चमक उठता है, कि प्रखर सूर्यकिरणोंसे उसका तेज मारा नहीं जा सकता। प्राचीन संस्कृत पुस्तकोंमें अग्निवृष्टिका उल्लेख मिलता है। यह अतिशय अमङ्गलका लक्षण है पूर्वकालमें अन्यान्य देशोंके लोग भी अग्निवृष्टिको सही समझते थे। किन्तु यह अद्भुत काण्ड सर्वत्र नहीं घटता, और न सब समय ही दृष्टिगत होता है। इसीलिए कितने ही दिनों लोग इसपर अविश्वास करते रहे। किन्तु अब कितनों होके चाक्षुष प्रमाणसे निश्चित हो गया, कि वास्तविक ही आकाशसे अग्निशिला बरसा करती है। लिवोका कहना है, कि सन् ६५४ ई०से पहले रोमनगरके निकटवर्ती अलबन पर्वतमें अनलशिला गिरी थी। फिर सन् ४६७ ई॰से भी पहले इगस्पोटेमोमें एक बृहदाकार प्रस्तर आकाशसे पड़ा था। प्लूटार्क और प्लिनी इसके विषयमें लिख गये हैं। पारियान-कनिकलमें भी इस प्रस्तरको बात उल्लिखित है। सन् १४९२ ई॰में आल्सेसके अन्तर्गत एन्मिरहम ग्रामपर एक बृहत् प्रस्तर आकाशसे पड़ा था, जो वज़नमें कोई तीन मन और दश सेर निकला। सन १६०३ ई॰को २६ वीं अप्रेलको मर्मन्दीके अन्तर्गत ला-आग्नीमें जो भयङ्कर अग्नियह मय शिलावृष्टि हुई, उसे कितनों होने देख पाया था। फ्रान्सीसी गवर्नमेण्टने विख्यात तत्त्ववित्पण्डित मोसिवो विवोस्को (M. Biot) इस विषयका तथ्य जांचनेके निमित्त रवाना किया। उन्होंने लाअग्नीमें पहुंचकर पुजानुपुङ्ख रूपसे सकल विषयका अनुसन्धान किया। पीछे उनका मत प्रकाशित हुआ, फिर आगसे भरे पत्थरको वृष्टिपर किसीको कोई सन्देह न रहा। लग-भग साढ़े तीन कोसके स्थानमें दो हज़ारसे न्यून पत्थर न पड़े थे। उनमें बड़े-बड़े पत्थरोंका वजन साढ़े तीन सेरसे कम न रहा। नक्षत्रपातकी तरह आकाशसे दूसरी भी एक अग्निवृष्टि होती है। इसकी समस्त अग्निशिला प्रायः अत्यन्त क्षुद्र रहती हैं। हम्बोल्टने लिखा, कि |
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अनलविवर्धनी-अनलशिला