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युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था। सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।[१] उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— "सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।m कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल[२]और लिपिशास्त्र[३]का उल्लेख
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होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था। ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल। इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे। पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा— १ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। (ललितविस्तर १० अ०) जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।[१]ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख†
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६१
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अक्षरलिपि