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"भक्ति स्वतः नष्ट नहीं होती, वेदविहित कर्म में प्रवृत्ति लगने से उत्पन्न हो जाती है। ऐसी भक्ति होने पर क्रमशः सुख भी मिलता है जो ईश्वर को बालकवत् प्रिय, पुत्रवत् स्नेहपात्र, सखा सा विश्वासभाजन, गुरु की भांति उपदेष्टा, बन्धु की तरह हितकारी और देव पूज्य समझता है; अर्थात् जो सर्वतोभाव से भगवान का भजन करता है, उसका काल कुछ बिगाड़ नहीं सकता। "प्रतिलोम बुद्धिविशिष्ट आत्मा ही पुरुष है। वह पुरुष अनादि, निर्गुण और प्रकृति से भिन्न है। पुरुष केवल साक्षीस्वरूप होता है। वह स्वयं प्रकाश पाता है और यह विश्व उसके साथ मिलजुलकर प्रकाशित हो जाता है। वही पुरुष अपने निकट विष्णु की शक्तिरूपा अव्यक्तगुणमयी प्रकृति को लीलावश पहुँचने पर भावनाक्रम से ग्रहण कर लेता है। प्रकृति अपने गुणों से समानरूप विचित्र प्रजा की सृष्टि करती है। जिसमें अविशेष और विशेष का आश्रय प्रधान पाता है, वही प्रकृति कहलाती है। फिर प्रधान त्रिगुण रहता है, अतएव अव्यक्त अर्थात् अकार्य ठहरता है। सुतरां वह न तो महत्तत्त्व और न जीवनस्वरूप नित्य अर्थात् जीव की ही प्रकृति है। प्रधान कार्यस्वरूप चतुर्विंशति पदार्थ हैं। यथा—भूमि, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश पंचमहाभूत; गन्धतन्मात्र, रसतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र तथा शब्दतन्मात्र पंचतन्मात्र; चक्षु, कर्ण, जिह्वा, घ्राण, त्वक्, वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ दस इन्द्रिय; मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त चार अन्तरिन्द्रिय। अन्तःकरण के अन्तरिन्द्रिय उच्चरते भी वृत्ति मिटने से उसमें चार प्रकार का भेद पड़ जाता है। यह चतुर्विंशति तत्त्व सगुण ब्रह्म के सन्निवेश का स्थान हैं। एतद्भिन्न काल पञ्चविंश तत्त्व है। "निष्काम धर्म, निर्मल मन, भक्तियोग, तत्त्व-दर्शिज्ञान, प्रबल वैराग्य, तपोयुक्त योग एवं दीर्घ समाधि द्वारा पुरुष की प्रकृति क्रमशः काष्ठ की भाँति अग्नि में जलकर भस्म की तरह विनष्ट हो सकती है। प्रकृति यदि एक बार नष्ट हो जाए, |
फिर उभरने नहीं पाती। उस समय पुरुष समझता है—इसका भोग समाप्त हो गया। पुरुष जब जन्म-जन्मान्तर से अध्यात्मरत होकर ब्रह्मलोक प्राप्ति के लिए भी वैराग्य पाता है और भगवान के प्रति ऐकान्तिक भक्तिमान बनता है, तब वह कैवल्यधाम में देहातिरिक्त सदाश्रयस्वरूप परमानन्द पाता है। फिर सिद्धिरूपी नाथ हो जाने से आनन्दलाभ कर पुनरपि उसको लौटना नहीं पड़ता। आत्मज्ञान के बल से सकल मिथ्या ज्ञान विनष्ट हो जाता है। कपिल मुनि ने अपने सांख्यसूत्र में भी दिखाया है—वस्तुमान सत् है अर्थात् किसी वस्तु का उत्पत्ति किंवा विनाश नहीं। वस्तु का आविर्भाव होने से हम देख पाते हैं और तिरोभाव होने से उसके लिये असत् कहा जाता है। आविर्भाव से पूर्व भी वस्तु की सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है। ऐसा न मानने पर एकमात्र उपादान से सकल कार्य उत्पन्न हो सकते हैं। असत्कार्यवादियों के मत में उपादान मृत्तिका के साथ घट के सम्बन्ध की भाँति पट का भी सम्बन्ध नहीं लगता। सम्बन्ध न रहते भी जैसे मृत्तिका से घट बनता है, वैसे पट भी बन सकता है। किन्तु उत्पत्ति के पूर्व कार्य को सत् स्वीकार करने से मृत्तिका से पट की उत्पत्ति की आपत्ति पड़ नहीं सकती, क्योंकि मृत्तिका से पट का कोई सम्बन्ध नहीं। जिसके साथ जिसका कोई विशिष्ट सम्बन्ध नहीं रहता, उससे वह उपजता नहीं! घट के साथ उत्पत्ति से पूर्व भी मृत्तिका का सम्बन्ध होता है, इससे मृत्तिका से घट बन जाता है। यदि उत्पत्ति से पूर्व कार्य असत् ठहरे, तो मृत्तिका रूप सत्कारण के साथ असत् घटरूप कार्य का सम्बन्ध बन न सके। सुतरां सत्कार्यवादियों के मत में घटसंसर्गशून्य मृत्तिका से घटोत्पत्ति होने की भाँति सम्बन्धशून्य मृत्तिका से पट की उत्पत्ति क्यों नहीं होती? और पटोत्पत्ति न होने की भाँति घट भी कैसे बन सकता है? दोनों विषय सत्कार्यवाद के स्थापन की प्रधानतम युक्ति हैं।" |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२
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कपिल