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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५५

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कव्यता कशाईफुलिया


ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि भवतः।
हव्यानि तु यथाशक्ति सर्वेष्वेव चतुप्वापि॥" (मनु १अ॰)

ऐसे ब्राह्मणका अभाव होनेसे मातामह, मातुल, भगिनेय, श्वशुर, गुरुद, दौहित, जामाता, बन्धु पुरोहित वा यजमानको कव्य दे देना चाहिये। मनुके मतसे वेदज्ञ रहते भी निम्नोक्त ब्राह्मणको कव्य खिलाना निषिद्ध है,—चिकित्सक, दैवज्ञ, कन्याविक्रेता, दुकानदार, चौर्यादि दोषोंसे पतित, क्रोध, नास्तिक, जटाधारी, दुर्बल, प्रतारक, राजाके प्रेष्य, कुनख, श्यावदन्त, गुरुकि प्रतिरोद्धा, अग्नित्यागी, राजयक्ष्मी, पशुपालक, ब्रह्मद्वेषी अग्निनेता, शूद्राणोपति, विषवार्के गर्भजात, काने, वेतन ग्रहणपूर्वक अध्यापना करनेबाले, शूद्रके शिष्य, दुष्टवादी, माता पिता एवं गुरुक्के अकारणपरित्यागी, गृहदायक, विषदाता, कुण्डान्नभोजी, सोमविक्रेता, समुद्रयात्री, अविवाहित, अग्रजके वर्तमान रहते विवाहकारी, जारज, बन्दी, तेलिक, कुटकारक, पिताके विवादकारी, मद्यप, पापरोगी, दाम्भिक, रसविक्रेता, धनु तथा शस्त्रनिर्माता, दिधिषूपति, मित्रद्रोही, दूतवृत्ति, पुत्राचार्य, अपस्प्राररोगी, गण्डमालारोगी, व्यवरोगी, खल, दम्भक्त, भ्रूण, वेदनिन्दक, ज्योतिषी, व्यंसायी, पक्षिपोषक, शूद्रशास्त्रके आचार्य, स्थपति, दूत, हत्यारोपक कृतरक्षी क्रीड़ाशील, श्येनपक्षिजीवी, कन्यादूषक, हिंस्र, शूद्रवृत्ति, गण्यायाकारी, आचारहीन, कृषिजीवी, श्लोपदरोगी, और सज्जनिन्दित।

कव्यता (वै॰ स्त्री॰) १ स्तुति, तारीफ । २ ज्ञान, समभ।
कव्यवाड़, कव्यवाल देखो।

कव्यवाल (सं॰ पु॰) कव्यं वहते द्रीयते अस्मै, कव्य-वह-

घञ्। १ पितृगणाविशेष।


"कव्यवाहोऽनलः सोनो यमस्य वायसना तथा।
अनिम्बाना वरिष्ठः सोमपाः पितृदेवताः॥" (ब्रह्माण्डपुराण)

२ अग्नि, आग। अग्निमुखमें ही पितृगणके उद्देश्यसे दान किया जाता है।

कव्यवाह् (सं॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-ण्वि। अग्नि, आग। इसमें पितृगणके उद्देश्यसे कव्य डाला जाता है।
कव्यवाह (सं॰ पु॰) कव्यं वहति प्रापयति पितृमिति

शेष; कव्य वह्-अण्। अग्नि, पितरोंको कव्य पहुँचानेवाली आग।

कव्यवाहन (वै॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-व्युट्। फव्यपुरीषुपुरौप्येषु ल्युट्। पा ३। २। ६४। १ अग्नि, पितरोंकोकव्य पहुँचानेवाली आग।

"अग्रये कव्यवाहनाय स्वाहा।" (शुक्र यजुः २। २९)

यजुर्वेदके मतमें अग्नि तीन प्रकारका होता है,— हव्यवाहन, कव्यवाहन और सहरक्षा। देवगणका हव्यवाहन, पितृगणका कव्यवाहन और असुरगणका अग्नि सहस्राक्षा कहाता है। (तैत्तिरीयसंहिता २। १। ८। ६)।

कश (सं॰ पु॰) कश्यति गच्छयते ताड़यति वा, कशअच्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। यह चर्म, वस्त्र, वेत्र प्रभृति द्वारा प्रस्तुत होता है।

"स राजा तं कशेन अताड़यत्।" (महाभारत ३।१९६ पः)

२ क्षुद्र पक्षु विशेष, एक छोटा जानवर।

कश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींच। २ दम, फूंक।
कशकु (सं॰ पु॰) गवेधुक, कसी, एक पौधा।
कथकोल (फा॰ पु॰) कवांल, खप्पर। इन्हें भिक्षुक अपने हाथमें रखते हैं।
कशमकश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींचखांच। २ घसारोड़, रेलपेल। ३ घसमघस, आगा पीछा।
कशस् (सं॰ क्ली॰) कशति नीचं गच्छति, कशअसुन्। जल, नीचे रहनेवाला पानी।
कशा (सं॰ स्त्री॰) कश टाप्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। "अघान कशया मोक्षात् तदा राघप्तवस्य निम्।" (भारत १। १७७। १०) २ मांसरोहिणी, एक खुश्बूदार पेड़। ३ रज्जु, रस्सी।
कशाई—१ नदी विशेष, एक दरया। यह बङ्गालके मेदिनीपुर जिलेंमें प्रवाहित है। पढ़े लिखे लोग इसे कांसवती कहते हैं। किन्तु कालिदासने अपने रघुवंशमें कपिशानदीके नामसे इसका परिचय दिया है।
कशाईमुखिया—पश्चिम बङ्गालकी एक बागदी जाति। यह कशाई नदीमें नौका चलाते और मत्स्य मार जाते हैं। चौदह प्रकारके बागदियोंमें कशाईमुखिया अपनेको श्रेष्ठ बताते हैं।