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कषायपाण-कषीका
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जिन सकल कार्योमें जलका परिमाण नहीं लिखते, उनमें आद्र द्रव्य रहनेसे अष्ट् गुण और शुष्क द्रव्य रहनेसे षोड़श गुण जलसे सिद्ध कर चतुर्थांश अवशिष्ट रखते हैं। कवायपाण (सं॰ पु॰) कषायः पानं यस्य, बहुव्री॰ णत्वम्। पानन्देशे। पा ८।४।९ गान्धार जाति।
कषाय प्राभृत—एक जैन शास्त्र। इसमें जीवको संसारमें भ्रमण करानेवालो कषायों का वर्णन है।
कषायफल (सं॰ क्ली॰) पूगफल, सुपारी।
कषाय मार्गणा—जैन ग्रन्थमें संधारी जीवोंकी विशेष अवस्था बतलानेके लिये १४ मार्गणा लिखी है। उनमें की एक मार्गणा।
कषाययावनाल (सं॰ पु॰) कषायः रक्तवर्ण; यावनालः, कर्मधा॰। तुवर यावनाल धान्य, कसैलो जुवार।
कषाययोनि (सं॰ स्त्री॰) कषायाधिकरण, कसैलेपनकी बुनयाद। यह पांच प्रकारकी होती है,—मधुर कषाय, कटुकषाय, तिक्तकषाय और कषायकषाय। (चरक)
कषायरस (सं॰ पु॰) रसविशेष, एक जायका। कषाय देखो।
कषायवर्ग (सं॰ पु॰) कषायाणां कषायरसयुक्तद्रव्याणां वर्गः समूहः, ६ तत्। कषायरस द्रव्यगुण, कसैली चीलोंका ज़खीरा। त्रिफला, शल्लकी, जाम्बू, आम्ब, बकुल, तिन्दुकफल, न्यग्रोध आदि, अम्बडादि, प्रियङ्गु आदि, दोध्रादि, शालसारादि, कतकशाक, पाषाणभेदक, वनस्पतिफल, कुरवक, कोविदारक, जीवकौ,
चिल्ली पलङ्की, सुनिषण आदि, नीवारकादि और मुद्न आदि द्रव्य कषायवर्गमें पड़ी हैं। (सुश्रुत)कषायवासिका (सं॰ पु॰) सुश्रुतोक्त कीट विशेष, एक नहरौला कीड़ा। यह कीट सौम्य होनेसे श्लेश्म-प्रकोपक है। इसका मूल विषाक्त निकलता है।
कषायवृक्ष (सं॰ पु॰) बटामलकादि कषायत्वक् फल वृक्ष, बरगद आंबला वगैरह कसैली छालके फलवाला वृक्ष।
कषायकष्क (सं॰ पु॰) प्रियङ्, आदि कषाय द्रव्यकृत आस्थापन विशेष, एक कसैली दवा।
कषाया (सं॰ स्त्री॰) कष-आय-टाप्। १ क्षुद्र दुरालभा, छोटा जवासा। (Small sort of Hedysarum)
Vol. IV.66
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इसका संस्कृत पर्याय—यास, यवसा, दुष्पर्णी, धन्वयास, दुरालभा, समुद्रान्ता, रोहिनी, गाम्भारी, कच्छुरा, धनन्ता, हरविग्रह और दुरभिग्रहा है। भावप्रकाशके मतसे यह मधुर, तिक्त एवं कषायरस, सारक, शीतल, लघु और कफ, भेद, मत्तता, श्रम, पित्त, रक्त, कुष्ठ, कास, तृष्णा, विसर्प, वातरक्त, वमि तथा ज्वरनाशक है। दुरालभादेखो। कषायान्वित (सं॰ त्रि॰) कषाय-रसविशिष्ट, कसैला।
कषायित (सं॰ त्रि॰) कषायः रक्तपीतादिवर्णः सञ्जातोऽस्य, कषाय-इतच्। १ रक्तादि वर्णयुक्त, लाल रंगा हुवा।
"असुनैव कषायितचनौ सुमगेन प्रियगात्रमक्षसा।" (कुमारसम्भव ४।३४) कषायी (सं॰ पु॰) कषायो विद्यते ऽस्य, कषायइनि। १ शालवृक्ष। २ लकुचवृक्ष, लुकाटका पेड़।
३ खर्जूरी वृक्ष, खजूरका पेड़। ४ सर्जवृक्ष, घूनेका पेड़। ५ शाकवृक्ष, सागौनका पेड़। ६ क्षुद्रपनस, छोटा कटहल। (त्रि॰) ७ कषायविशिष्ट, गोंददार। ८ कषायान्वित, कसैला। ९ संसारासक्त, दुनियाकी बातोंमें उलझा हुवा।कषायीकृत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायः कृतः, कषाय-चि-क्व-त्त। कषायवर्ण हुआ, जो सुर्ख किया
गया हो।
कषायीकृतलोचन (सं॰ त्रि॰) कषायवर्ण चक्षु, बनाये हुवा, जो आंखें लाल कर चुका हो।
कषायीभूत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायो भूतः, कषायचि-भू-त्त। रक्त वर्ण बना हुवा, जो लाल पड़
गया हो।
कषि (सं॰ त्रि॰) कषति हिनस्ति, कष-इ।
खनिकष्विचसिवसि इत्यादि। उण्। ४।१२९। हिंसक, नुक्सान पहुंचानेवाला।
कषिका (सं॰ स्त्री॰) पक्षिजाति, कोई चिड़िया।
कषित (सं॰ त्रि॰) कष-क्त। परीक्षित, कसा हुवा, जो चोट खा चुका हो।
कषौका (सं॰ स्त्री॰) कषति, कष-ईकन्-टाप्। कषिदूषिभ्यामीकन्। उण् । ४।१२९ । १ पक्षि जाति, चिड़िया। कषत्यनया। २ खन्ता।
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