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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७७

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कानपुर

बिरहोरमें ५१४३ पौर अकबरपुरमें ६३४८ नांगोंका वास है।

कानपुर नगर गङ्गानदीके दक्षिण कूल पर प्रव- स्थित है। प्रयागके विवेणीसङ्गमसे १३० मोच ऊपर यह नगर पड़ता है। युक्तपदेशमें कानपुर चतुर्थ नगर है। समुद्रपष्ठसे यह ५०० फीट ऊपर है। निवास (छावनी ), अदालत, टेशन इत्यादि विद्यमान हैं। सेनानिवास और अदालत गङ्गा किनारे है। पूर्वा शमें देशीय पखागेही सेनानिवास और कवायद परड़की जमीन है। कवायद परड़की नमोनसे पशिम युरोपीय पदातिको वारीक और सेण्टजान गिरना है। इसके मध्य गङ्गा किनारे मेमोरियल गिरजा है (यह १८५७ ई को सिपाही-विद्रोहके स्मरणार्थ बना था)। नगरके उत्तरांशमें साधारण कवायदपरड़को जमीन है इसके सम्मुख गङ्गातीर म्युनिसिपल गार्डन है। इस उद्यानमें एक कूप था। आज कल उसी कूप पर एक स्तम्भ बनाया और उसकी चारों और प्राचीरका घेरा लगाया गया है। इस स्तम्भ पर एक वर्गविद्याधरीको मूर्ति है। स्तम्भके गावमें अंगरेजीसे लिखा है- "विठूरके विद्रोही नाना धुन्धुपन्यके दलने १८५७ ईको १५वौं जुलाईको इसी स्थानके निकट अनेक युरोपियों विशेषतः युरोपीय स्त्रियों और शिशवोंको अन्यायरूपसे मार इस कूप में डाल दिया था इस उद्यानको रक्षा के लिये गवरनमेण्टका वार्षिक ५००००/ रु. खर्च होता है। उस विद्रोहमें जो निहस हुये, वह इसी उद्यानके दक्षिण और पश्चिमांशमें गड़े हैं।

कानपुर नगर प्राचीन नहीं। इस लिये यहां दर्शनीय अष्टालिका, प्रासाद पौर मन्दिरादि कम है।

१७६४१० को बकसर और १७६५ ई०को कोड़े के युद्दमें शुजा-उद-दौला (अवधक नवाबवजीर) परा- जित होनेपर यह नगर बना। नवाब अंगरेजोसे सन्धि कर फतेहगढ़ और कानपुर में सैन्य रखने पर खोजत इये थे। १७७८ को वर्तमान स्थान नवाधिनत स्थानको प्रान्तसीमाके सेनानिवासको निरूपित होनेसे इस नगरको नीव पड़ी। १८०१ १०को अंगरेजोने अवधके नवाबसे इसको चारो ओरका स्थान पाया था।

उस समयसे कानपुर एक जिया और प्रधान नगर गिना जाता है। १८५७ के सिपाही विद्रोहको छोड़ दूसरी कोई ऐतिहासिक घटना या नहीं हुई।

मुसलमानोंके अधीन यह जिला पनेक परगनौम विभक्त था। उस समय कानपुर इलाहाबाद और यहां सेना प्रागरेमे लगता था। ११८४० को सारव उद्-दोन गोरीने दोवाव अधिकार किया, उसीके साथ कानपुर भी उनके हाथ लगा। औरंगजेबके समय यहां दो एक सामान्य मपनि वनों यो। मुगच सबाटोको दुर्दशाके समय १७२६ ई०को यह अंश महाराष्ट्रोंके अधिकारमें गया। प्रवधके नवाबसे सन्धि होने पोछ अंगरेजी सेनाने प्रथमतः बेलगांव (विश्वग्राम) और फिर कानपरमें श्रावस्थान किया।

सिपाहीविद्रोहके समय कई दिन तक समस्त जिलेमें विद्रोहानच जला था। मेरठमें विद्रोह भारम्भ रक्षाका भार सौंपा गया । जुनमासके प्रथम यहां चारो

पोर किले और गड्ढे बना समस्त यूरोपीय बैठे थे।

ठौं जूनको कानपुरका देशीय द्वितीय पधारोही दन्त तथा प्रथम पदातिदलने बिगड़ ने तोड़ा, धनागार लटा और पाफिस भादिको गिरा डाला। उसके पीछे विद्रोही दिल्लीक अभिमुख चले गये। उसी समय ५३ एवं' ५४ संख्यक सैन्धदर विद्रोही हुवा। नानासाहवने विद्रोहियोंसे मिन उनके साहाय्यसे यूरोपियों के आवास पाक्रमणपूर्वक तीन सप्ताइ अव- रोध किये थे। वैवीगारदसे अंगरेज (कैवलं सात सौ या एक हजार ही लोग हांगे ) धूपमें खड़े हो चड़ने शेषको अधिकांश अंगरेज मारे गये। बिद्रोही उन्हें परास्त कर उन्मत्त भावसे स्त्रियां और शिशवोंको भी मारने लगे। २५ो जूनको नानासाहबने तावशिष्ट अंगरेजीको रचा करनेमें प्रतिश्रुत हो सबको लेकर कानपुरके सतीचौराघाटमें नौका पर बैठाया था।नौका इलाहाबादको खुननेके पहले तोरस विद्रोही सिपाही गोली चला पारोहियोंको गिराने बगे। दी नौकाबौने भागनेको चेष्टा को थी। किन्तु सिपाहियोंने