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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९५

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काफिर

हमके मध्य में प्रपेचात कई विख्यात श्रेणियोंकी करते हैं।

पान्दामान दोपके मीनकपी काफिर-मालूम पड़ता है कि मनुष्य श्रेणीमें उनको अपेक्षा असभ्य जाति दूसरी कम मिलेगी। धनके वासस्थानको स्थिरता नहीं, परिधेय वस्त्रादि नहीं और उन्हें यह भी ज्ञान नहीं जीविकाके लिये किस प्रकार कार्य करना पड़ेगा। मौनकपी लोगोंके साथ मिलना तो चाइते हैं, किन्तु पनिटप्रिय होते हैं। नरमास नहीं खाते भी वह शूकरमांस, मत्य प्रभृति भक्षण करते हैं। मौनकपी जङ्गली फल एवं मूल तोड़कर और झील तथा पुष्करिणौसे मत्स्य पकड़कर खा जाते हैं। वह धनुर्वाण ले वन वन और पुष्करिणी पुष्करिणी घूमते फिरते हैं। बाँसको खपाचसे मछली पकड़नेका कांटा वह लोग । बना लेते हैं। वह वस्त्र नहीं रखते और न रहने कोई लना नहीं करते। मौनकयो क्षुद्रकाय होते हैं। उनका मस्तक छोटा पौर तालु चपटा रहता है। वह अपना सर्वाङ्गकांचसे खरोंच खरांचकर शरीरको शोभा सम्पादन करते हैं। बामन्त तथा कण्ठमूलसे मणि वन्ध एवं कटिदेश पर्यन्त अङ्गको चारो ओर गोलाकार खरीचके दागोंसे मीनकपी प्रति विश्री और भयानक लगते हैं। किन्तु वह उसीको अपनी प्रधान शोभा समझते हैं। किसी विषय पर सन्तोष प्रकट करते समय मोनकपी दक्षिण इस्तमें तालुंके निम्न भागपर धीरे धीरे दन्ताधात कर बाम स्कन्धेपर एक थप्पड़ लगाते हैं। सईस घोड़ेका बदन मलते वक जैसे उपक देते हैं, वैसे ही शब्द निकाल वह चुम्मा लेते हैं। परस्पर कथोप कथन करते समय मौनकपी ऐसा गड़बड़ उच्चारण करते हैं, मानो चं चं कर ही मनोभाव प्रकाश करते हों। किन्तु वास्तवमें यह बात ठीक नहीं। उड़ियों की भांति उनकी उच्चारण प्रणाली प्रति द्रुत और अस्पष्ट होती है। उनको नाचना बहुत पच्छा लगता है। नाचते समय यह दोनों हात मस्तकको भोर उठा सङ्गीतके तास ताल पर कूदते फांदते हैं। फिर नृत्यमें कभी मीनकपी मस्तक घुमाते और कभी समस्त मरोर सम्मुखकी ओर भुका चाते हैं। इस प्रकार मौनकपी सङ्गीत और

नृत्यके ताल ताल पर मामारुप भाभी किया करते हैं। मां, विला-भान्दामात दीपके पूर्व मतय उप-होपके अन्तर्गत केदा, पेराक, पाहा और विज्ञानु प्रदेशमें जो काफिर रहते हैं, उन्हें मचयके लोग "ममा तथा "बिला करते हैं। उनका व कृष्ण, केय मण- सदृश और गठनादि अफरीकावासियोंकी भांति खर्वा- कार होता है। पूर्णवयस्क पुरुषको उच्चता तीन जायसे अधिक नहीं बैठती। उनके भी निर्दिष्ट वासस्थान और वषिकार्यका अभाव है। उनमें अधिकांश धूम धूम कर वनका उत्पन्नादि संग्रह करते हैं और उसे ही मचय- जातीयोंके निकट व्यवहार्य द्रव्यादि बदलते हैं। वह शिकार मारते और शिकारमें पाये पशु-पक्षी वा उसका चर्म पालकादि विनिमय कर खाद्यादि लाते हैं।

में क्रियान नदीको उपनदी इमानके तौरवर्ती स्थानमें "मेमां बुकित्" नामक येणोके काफिर रहते हैं। वह पूर्णवयसमें सवा तीन हाथ होते हैं। उनका मस्तक क्षुद्र, मस्तकका सम्मुखभाग कुछ कोणाकार बच्च, और पवादभाम वतुंलाकार तथा मध्यांपकी अपेक्षा प्रशस्त होता है। मलयजातीोसे सेमा बुकितीका मुखमण्डन साधारणतः अप्रशस्त, धदेश उन, नयनकोटर प्रति गम्भीर, नासिका नोची और छोटी एवं नासिकाका अग्रभाग सूक्ष्म तथा उठा हुआ होता है। पांखका परदा पीला, पक्ष्म धन-दीर्घ-कुचित, हनुदेश एवं मुखविवर प्रशस्त और होठ मोटा तथा छोटा रहता है। भू तथा नासिकाके अग्रभाग पौर हिदको उच्चता समान होती है। उनका उदर बात रहते भी शरीर अपेक्षाकृत धीव सगता है। यह वानरको भांति उदरको घटा बढ़ा सकते हैं। गावका धर्म साधारणतः कोमल और चिक्य होता है।

निशानुको सीमाङ्ग नामक श्रेयी केदादियों की भांति- कुछ तरलवर्ण है। वह लोग सेमा बुकितोंकी भांति- मसूण घोर कष्णवर्ण नहीं होते। उनके बाल जनसे नहीं मिलते, टेदे टेढ़े और घटोत्कची भांति कंधे रहते हैं। माड़वारियोंकी भांति खूब धनी मोटो.मूह रहती है। मस्तकको बनावट मखयों या काफिरोंकोः