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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९६

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काफिर

भांतिनी होती, अधिकतर पापुयावोंसे मिलती है। उनका स्वर परिकार तथा कोमन लगता, किन्तु अनुमासिक रहता है। वह कपास और कपोत्नमें गोदना गोदाते हैं। दक्षिण कण छिदा कर बड़ा छेद रखते हैं और सम्मुखभागमें बालोंका एक गोलाकार गुच्छा छोड़ समस्त मस्तक मुण्डन करते हैं। पेराकके नदीकूलवर्ती सेमात "सेमानित पाय" कहाते हैं। वह समुद्रतीरसे पर्वतको ऊपर तक सकल स्थानमें रहते हैं। किन्तु बुकित वन और पावत्य स्थान भिन्न जसके उपकूलभाग वा नदीतीरको नहीं जाते। फिर "सकि' श्रेणौके लोग पावत्य प्रदेशसे नीचे उतरना कब जानते हैं। केदा.और पराक सेमाङ्गोंकी भाषामें दो शब्दोंके योगन शब्द छोड़ अन्य कोई बड़ी कथा वा समासवाक्य नहीं। जिन सकल स्थानों में सेमात लोग रहते हैं, उनमें मलयनातीय नहीं मिलते।

पाया पीके काफिर-शोरिस, मुम्बब शिक्षा वा इन्दना, अदेनारा, सलर, लवटा, रताव, श्रीम्बे, श्रोयेउर, रत्ती, सर्वत्ति, बब्बर, तिमर, तिमरताउत, खाराट, नव कालिडोनिया, नव प्रायलेण्ड, पाटाहायटी पसिनसिया, फिजी, मालकस, नवगिनौ, पोपो, वासन्दा, किंवोप, अम्बयना, सालवत्ती प्रभूति पूर्वाशको दीपा वचौम वास करते हैं। जिन सकल दीपेमि उस नातिक काफिर रहते हैं, उन्हें मायके लीग "तानापापुया" (पाया जातिके वासखाम) कहते हैं।. बाल धू'घर वाले होनसे ही उनका नाम पापुया" पड़ा है। क्योंकि मलय भाषामें टेढ़े वानोको “पुया-पुया कहते है। घुया-मुया शब्दसे पाया शब्द निकला है। उनकी करती है। मागेशनमें पाया जातिके लोग देख प्राकति विलकुश काफिरोसे मिलती है। नासिका प्रशस्त होती है। हाँठ मोटा और बड़ा रहता है। कपाल दवा दुपा होता है। रग मटमैला लगता है। पधिगालकका चतुष्याच सफेद होता है। वह दक्षिणपूर्व एशिया अन्यान्य काफिरोये पूर्णगठित और बलिष्ठ है। पापुया लोग. उसाही, अध्यक्सायो और परिश्रमी होते हैं। उन सब गुणोंसे. विसो समय उनको सभ्य देशम दासकी भांति पधिक बेचते थे औरतीय भी पाहावार से देती थे। उन्त्री

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IV.

मानसिक वृत्ति मयजातिको पपेक्षा होन न रहते मी बहुत चक्षर होती है। इसीसे वह स्वाधीन भावमें रह नहीं सकते। मलयजाति के साथ विवाद में इसी कारण पाया हार जाते हैं।

वह नवगिनी तथा उसके निकटवती होपमें समुटुक उपकूलपर वास और अन्यान्य स्थलों में पार्वत्य- प्रदेशपर अवस्थान करते हैं। बहुतसे होपोंमें तो उनकी संख्या विलकुल घट गई है। सिराम पौर गिलोलो द्वीपमें वह कभी कमी मुश्किलसे देख पड़ते हैं। बहुतोका अनुमान है कि, कान पाकर पाया पृथिवीसे उठ जायेंगे, क्योंकि शिकारके भूखे पपेक्षा कृत ताम्रवर्ण जातीय लोग उनको अधिक मारते हैं। किन्तु यह वम है। कारण जहां जहां माजकल युरोपीय सभ्यता फैलती, वहां वहां उन्हें परस्पर दिन दिन. मिलजुल कर रहनेको मिचती जाती है। सिराम और गिलोचो दीपमें रहनेवाले पत्वाधारसे उत्मोडित हो अतिशय भीर बन गये हैं। वह किसी सभ्य मातिक साथ एक दम ही बैठते उठते नहीं। अपरिचित वा भिन्न जासिको लोगोंको देख जंगसमें भाग छिप जाते है। माइसल नामक वृहत् होपमें उस जातिको छोड़ अन्य कोई जाति नहों रहती। केवल उपकूल भागमें एक प्रकारको मिश्र वा सहरजाति देख पड़तों है। उसको भी प्राकृति प्रति उनसे बहुत कुछ मिलती है। उस सझरनाति नाविकतामें विशेष पारदर्थो होसी है यह खुरापीोसे सदय व्यवहार पड़ते हैं। किन्तु उसके निकटवर्ती जेतु दीपमें या बिलकुल नहीं पाये जाते। .. यह भी सुनने में नहीं पाता किसी समय वहां पापुयावांका वास था। नवगिनि, कि, पलं, माइसल, सासवप्ति प्रकृति दीयोंमें उस जातिके लोग रसते है. पौर. वही श्रेणी फिजी दीप तक विस्तृत है। उनके बाल बड़े और बहस टेदे होते हैं। पूर्णवयस्कों के मस्तकपर उसी प्रकारके बास पब बढ़ कर टापौकी मांति बन जाता। उन्हें बेटे 'बार प्रमोक्षगते १.: उनको