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दादी के बाद मी वैसे ही टेढ़े होते हैं। दोनों हाथ, पैर और हासोमें भी कुछ बैसे ही वास रहते हैं। अक्षतामें वह माय जातिको प्रयेला दोध, प्रायः युरोपीयांकी मांति होते है। पदय दीर्घ राते हैं। मुखमा दीर्घाकार, कपास चपटा, नासाछिट्र प्रशस्त, सुखवियर बड़ा और मोठ मोटा तथा भारी होता है। वह वामकाज और बातचीतमें बड़े हड़प्रतिज्ञ होते हैं। वह लोग पिता कर और खूब जोरसे हंस हंस कर तथा उस कूद कर आनन्द प्रयास करते हैं। वर यह हार, नौका और तेजस आदिको खोद कर चित्र बनाते हैं। अपनी अपनी शिशसन्तान पर पापुया बहुत कुह रहते हैं। वह वेपो कभी सामाजिक बन्धनमें पड़ रहन सकेगी। समझमें ऐसा पाता कि काल पाकर युरोपीय सभ्यता फैलनेसे उस पुरमिय जातिका सीप होगा। वह बड़े विवासी होते हैं। हत्काय पाया थातिमें श्रेष्ठ और वनादिमें विख्यात है। उनका विस्तृत स्कन्ध और गमोर वक्षस्थर प्रीतिकर देख पड़ता है। काफिर जातिका साधारण दोष पददयको शीयता और अपूर्णता है। पायुयानों में भी इसका प्रभाव नहीं। स्वाधीन पाया कपड़ा जाति बड़ी प्रतिहिंसापरायण और महतस्वभाव है। नव गिनिके उत्तरपूर्व प्रान्तमें वह रहते हैं। पापुया अपने देशमें अन्य किसी जातिको निरापद वसने नहीं देते। निहायत परेशान करके भी भगानसकनेसे अपना स्थान छोड़ भभ्यन्तरमागमें पार्वत्य प्रदेश पर वह चले जाते हैं। पापया गोदना नहीं गोदात। किन्तु अर, वक्ष और पृष्ठ पर एक प्रकारके प्रलेपसे चमड़े को उभार बह कड़ा कड़ा पावला बना लेना अच्छा समझते हैं।, कभी कभी यक्ष कर पाया उसे एक अंगुल तक ऊंचा उठा देते हैं। शोरिस और नवगिनि प्रति होपों में काफिरो भी बसते हैं। नवनिनिके पाया भित्र भित्र चौक वृत्तिको साध परबर बुद्धमें लिप्त रहते है। इस युपमें विपक्ष पचका मक्षक काटन सबने से कोई पच निरत नहीं होता भवमिनिके काफिर एकबाहमयी प्रतिमाको पापना करते हैं। देवताका नाम "बारवर" हैं। |
प्रतिमा १८ रहती है। प्रत्येक घटनाको वह उस देवताकै निकट प्रकाश करते हैं। उनकी विधवायें खामौके सामं रहती है। प्रन्याय सामों काफिरॉकी अपेचा मवगिनिके पापया सम्य हैं। किन्तु अधिकांय प्रति सामान्य पर्णकुटीरमें रहते हैं और शिकार या स्वभावजात फरमूखसे जीविका निर्वाह करते हैं। उपकूलमागके पापुया अपेक्षाकृत सभ्य है। वह अंचे खम्भोंपर खत्तीको भाति महे घर बांध रहते है। डोरी दीपमें पापुयायोंको "माईफोर" कहते हैं। वर साढ़े तीन हाय दोध होते हैं। जातिमुखम कुचित केयों को माइफोर स्त्रियोंको मासि बढ़ाकर रखते हैं। उन बाचक चारण व अधिक भयानक लगते हैं। पुरुष थिरमें एक कंघी खोस रखते। किन्तु स्त्रियां वैसा नहीं करती। उनकी दाड़ी शोम कुक्षित, कपाल उच्च एवं प्रशस्त, चक्षुइय बड़े, वर्ष काला, नाव चपटी और पोष्ठ मोटे होते हैं। किन्तु दांत विचकुच मोतीको भांति रहते हैं। पुरुष कपिल की भांति एक प्रकारका छोटा कपड़ा पानी का मार" नामक पक्षको छायसे बनता है। उनकी स्त्रियां नीले रंग के सूत्रका वन परिधान करती है। वह घंटने के नीचे नहीं पहुंचता। उत्सवादि का गोदना गोदाते हैं। वह गोदना अधिक दिन नहीं रहता। गोदना गुदाते समय मछली कांटेसे वहां गोदना बनाना चाहते हैं, वहां रख निकाल कर भूषा लगा देते हैं। वह समुद्रगमनमें पतिमय पारदर्थी को होते हैं। नौकाके वासन, सन्तरण और समुद्री डबकी मार समुद्र के गर्भपर कर्मादि करने में उनकी बराबर निपुष और कोई नहीं होता। वह बचको पड़ी खोद अपनी नौका प्रस्तुत करते हैं। मकई, धाम और मिसनसे शूकर मांस भी खा जाते हैं। वह चौर्य- सर्वापेक्षा दुख और खपराध समझते हैं। माइकोर साम्प दोषयनित है। विवाह एक बार होता है। पर दीप बाम खान-पर परिवारमपूर्ण इवाय पोर दुबम निरोग -मान |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९७
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बाफिर