सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४३
कमलखण्ड—कमला

सकल पूजा महासमारोहसे सम्पन्न करते। विशेषतः ब्राह्मण पण्डितों पर इन्हें विलक्षण यथाभक्ति थी। दीनदरिद्रियों को यह यथेष्ट साहाय्य पहुँचाते। फिर ब्राह्मण पण्डितोंको भी यह कितनी ही ज़मीन माफ़ी दे गये हैं। कहते—रामकमलके घरसे कभी अतिथि विमुख फिरते न थे। ५३ वत्सरके वयसमें ५ पुत्र, कलकत्ते एवं चन्दननगरमें भूमिसम्पत्ति और बहुतसा नक़द रुपया छोड़ इससंसारसे रामकमल चल बसे। मध्य मध्य कलकत्ते आ अपने भवनमें यह ठहरते थे। सर्वप्रथम उसी भवनमें डेविड हेयरने हिन्दू-कालेजकी स्थापना की। फिर राममोहन रायने भी उसी भवनमें प्रथम अपना मत चलाया और डफ साहबने आकर बङ्गालकी चारों ओर मिशनरी भेजनेका बीड़ा उठाया था। कलकत्तेमें आदि ब्राह्म-समाजके निकट दो-तीन मकान छोड़ कमल बसुका वही प्रसिद्ध भवन विद्यमान है। इनके वंशधरोंसे मल्लिकांने उक्त भवन खरीद लिया है। आज भी धनीलोग उसे 'फिरङ्गी कमल बसुका घर' कहते हैं।

कमलखण्ड (सं० पु०) कमलानां षण्डः समूहः, ६-तत्। पद्मसमूह, कँवलोंका मजमा।
कमलसम्भव (सं० पु०) कमलात् सम्भव उत्पत्तिर्यस्य, बहुव्री०। कमलसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा।
कमलसिंह—कच्छपवंशीय एक प्राचीन विद्वान् नरेश। १३२५ ई० को यह राज्य करते थे। कमलसिंह देववर्मा (१३५० ई०) के पिता और वीरसिंहके पितामह रहे।
कमला (सं० स्त्री०) कमल-टाप्। १ लक्ष्मी। यह विष्णुकी पत्नी हैं। २ सुन्दरस्त्री, खूबसूरत औरत। ३ निम्बुकविशेष, नारङ्गी। इस वृक्षको संस्कृत भाषामें कमला, नारङ्ग, नागरङ्ग, सुरङ्ग, त्वग्गन्ध, त्वक्सुगन्ध, गन्धाढ्य, गन्धपत्र एवं मुखप्रिय; हिन्दीमें नारङ्गी, बङ्गलामें कमला नेंबू, नेपालीमें सुन्तला, पञ्जाबीमें सन्तरा, गुजरातीमें नारङ्गी, बम्बईमें नारिङ्गाल, मारवाड़ीमें सङ्गत्रिया, दक्षिणमें नारिङ्गी, तमिलमें किघिलि, तेलुगुमें गच्छनिम्म, कर्णाटीमें कित्तलीहण्णु, मलयमें माङ्कुरनारघा, महिषूरमें जेरुक, अरबीमें

नारञ्ज, फ़ारसीमें नारङ्ग, ब्राह्मीमें थञ्जय और सिंहलीमें दोदन्म कहते हैं। (Citrus Aurantium) इसको अङ्गरेजी आरञ्ज, फ़्रेंच आरञ्जर, पोर्तुगीज़ लरञ्जिरा (Laranjeira de fructo dolce), डचो नारञ्छ, डानीय नारञ्छ, जर्मैन योरङ्गेन बौम (Orangen baum), इटलीय अरनसिचो (Arancio) और लाटिन अरञ्छिया (Arangia) है। अङ्गरेजी 'आरञ्ज' शब्द अरबी 'नारञ्ज'का अपभ्रंश है। फिर अरबी 'नारञ्ज' संस्कृत 'नारङ्ग' शब्दका रूपान्तर मात्र लगता है। इस बातपर भी गड़बड़ पड़ता—नारङ्गका नाम कमला क्यों चलता है। किसी किसीके कथनानुसार आसाममें कमला नदी है। उसके निकट बिस्तर उत्पन्न होनेसे इसको कमला कहते हैं। फिर कोई बताता—पहले त्रिपुराकी राजधानी कुमिल्लामें यह नीबू आता था। इसीसे कुमिल्लाके प्राचीन नाम कमलाङ्कके बदल कमला नाम पड़ गया। किन्तु हमारी विवेचनामें यह दोनों बातें ठीक नहीं। क्योंकि बहुत दिनसे तैलङ्ग देशमें इसे 'कमलापण्डु' कहते आये हैं। फिर कमला नाम भी अन्ततः २।३ शत वर्षका प्राचीन है। कल्याणन्दने तन्त्रसारमें इसका उल्लेख किया है—

"रम्भाफलं तिन्तिड़ीकं कमलं नागरङ्गकम्।
फलान्येतानि भौम्यानि एण्योण्यानि विवर्जयेत्॥"

इसकी कृषि भारतके अनेक प्रान्तमें होती है। विशेषतः खाशिया पहाड़ोंके दक्षिण सुखको उपत्यका और मध्यप्रदेशके नागपुर जिलेमें इसे बहुत लगाते हैं। कुछ कुछ नारङ्गी नेपाल, सिक्किम और हिमालयके दो-एक स्थानमें भी लगायी जाती है। ब्रह्म-देशमें यह बहुत कम होती है। निम्नभूममें या तो फल ही नहीं आता या फ़ीका पड़ जाता है। भारतवर्षमें जलवायुके अनुसार दिसम्बर और मार्च मासके मध्य फल उतरता है। नागपुरकी नारङ्गी वर्षमें दो बार होती है। उद्भिद्तत्त्वज्ञ डि कण्डोलने लिखा,—'दो सहस्र वर्ष पूर्व भारतवर्षमें कमला नीबू न था। यदि इसका अस्तित्व रहता, तो संस्कृत ग्रन्थमें अवश्य उल्लेख}}