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उत्पन्न हुवे-चाक, सुचारु, चित्राच, मतिमान. चित्रचार, परुण और असीन्द्रिय। फिर मुदक्षिणाके गर्भसे भानु, विभानु, विश्वमान और वीर्यभानु चार पुत्रने जन्म लिया। ब्रह्माने चित्रगुप्तके वंशको वधि होते देख एक दिन पानन्दसे कहा था-'हमने अपने वाहुसे मृत्युलोकके अधीम्बर रूपमें क्षत्रियों की सृष्टि की है। हमारी इच्छा है कि तुम्हारे पुत्र भी क्षत्रियो। उस समय चित्रगुप्त बोल उठे- 'अधिकांश राना मरकगामी शंगे। इम नहीं चाहते कि हमारे पुर्वाक पदृष्टमें भी वही दुर्धटना पा पड़े। ' हमारी प्रार्थना है कि पाप उनके लिये कोई दूसरी व्यवस्था कर दीजिये। अनि इंस कर उत्तर दिया- 'अच्छा, आपके पुत्र सिके बदले लेखनी धारण करेंगे। चार जन्म वह इसी यमलोकमें रहेंगे। उसके पीछे इच्छा करनेसे वह देवलोक में धास कर सकेंगे। अनन्तर चित्रगुप्तके सन्तान इहलोक पा श्रीवास्तवोंमें दो भाखा है-एर और 'माधुर' नाम गण्य हुवे। सुचारु गौड़में जा कर रहने लगे और उसीसे 'गौड़ कई गये। चित्र मह नदीके कूल पर जा कर रहनेसे 'भहनागरिक' नामसे गण्य दुवे। भानु 'श्रीवास' नामक स्थानमें ना कर रहे और 'श्रीवास्तव' नाससे ख्यात दुवे। हिमवान् देवी अम्बाको आराधना करनेमे 'अम्बष्ट', मतिमान् अपनी सही पथात् भार्याके साथ चलनेसे 'सखिसेन' और विभानु 'सूरसेन देशमें जाकर रहने से'सूर्यध्वज'* कहे गये। यहां नरन्तोक विस्तार कर उन्होंने वर्ग- लोककी गमन किया। यह समझ नहीं पड़ता कि ऐतिहासिकों 'दृष्टिमें उक्त उपाख्यानका विशेष मूस्य है। फिर भी चित्रगुप्तके पुत्रोंकी भांति जिन कई लोगांका नाम लिखा गया है, परिमाचलस्थ कायस्थोंके मध्य कोई कोई श्रेणी पपनेको उक्त किसी न किसी व्यक्तिका वंशधर बसाती है। यहादेव कायस्यों का एक विवरण पहला-कामधेनु-भूत निकी इस बातका प्रभाव मिलता है। कास्योंका यर ममा ताकि श्रीगाया मी See Origin and States of the Kajasthao, published by Hargorinda Babays, xh, p. 13. ! ** |
पाजकल युक्तपदेयके कायस्य प्रधानसं: १२ वीम विमा है- श्रीवास्तव्य वा ओशस्तव, २ भटनागर, ३ अकसेन, ४ अम्बष्ट वा पमष्ठ, ५ पैठान वा पहान, ६ वाल्मीक, ७ माथुर, ८ सूर्यध्वन, ८ इन्चेह, १०करण, १९ गौड़ और १२ निगम। सिवा इसके नाव जिलेके नामसे 'उनाई एक पृथक शाखा है। यौवासा वा श्रीवास्तव कायस्थ-अपनेको चित्रगुप्तके. पुत्र भानुका बंधधर बताते हैं। उनके पूर्व- पुरुष काश्मीरके श्रीनगरमें राजस्व करते थे। उसोये श्रीवास्तव्य' पाख्या हो गयो। उक्त कथा मी थीवास्तव कहा करते हैं। फिर किसीके मतमें यौवक्र विष्णुके उपासकोंको श्रीवास्तव कहते हैं। किन्तु कोई कोई युरोपीय पुराविद अवध प्रदेशस्य गोंडा जिलेकी श्रावस्ती नगरोसे श्रीवास्तव नामको उत्पत्ति बताता है। किन्तु भेष दोनों मत कल्पनामूलक समम पड़ते हैं। गये। उक्त बार लोगों में चार मथुरा गये और दूसर। खर शाखा ही सत् वा श्रेष्ठ मानी जाती है। दूसर सम्मानमें बहुत छोटे हैं। एक प्रवाद -अयोध्या में जाकर जी बसे, वही 'खर' वा श्रेष्ठ और जो अन्य खानमें जा कर रहे, वह दूसर हैं। फिर किसी किसीके कथनानुसार पहले इस प्रकार दो याखाये नथौं। सम्राट अकबरके ही समयसे उन दोनाको दृष्टि हुयी है। उस समय एक व्यक्तिले प्रति घृणाके साध रानप्रदत्त उपहार त्याग किया था। उनका नाम 1 'अखोगे प्रधान धर्मपरायण हुवा। मांसपर्थ न करने की प्रखोरी नाम हो सकता है। इलाहावादी और फतेहपुरी श्रीवास्तयों में निपो. सवान और और बुद्धि प्रदान नामक दो कुल देख पड़ते हैं। युक्तप्रदेश में श्रीवास्तवोंकीकी संस्था अधिक
पावित्रत यो है, उनमें श्रीकानन्य नाम को मिलता है। श्रीवझ' भएका 'श्रावती' कमी यह शब्द निया की नहीं सकता। बसपारको राश कि काश्मीरमें गाबाद यून हैं। |
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कायस्थ