पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१२७

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लक्षणा शब्दके तीन प्रकारको शक्ति है, लक्षणा, ध्यसना और । पत्र यहा पर लक्षणाशक्ति द्वारा कलिङ्ग शब्दमे कलिङ्गदेश. यभिधा। इन तीनों प्रकारको शक्ति द्वारा सभी जगह वासी आदमी समझा जाता है तथा उस लक्षणाशक्तिके अर्थवोय होता है। अर्शवोधके लिये ये तीन प्रकारकी वल ही ऐसा अर्थ हो कर वक्ताका प्रयोजन सिद्ध होता शक्तिया स्वीकृत हुई हैं। इन तीन प्रकारके शब्दको शक्ति है। अतएव यहां पर लक्षणा द्वारा प्रयोजन सिद्ध, हुआ, यदि स्वीकार न की जाय, तो अर्थवोध हो ही नहीं। इस कारण इसे प्रयोजनसिडिका उदाहरण समझना सकता। इस कारण शब्दशास्त्रविद् पण्डितोंने शब्दकी , होगा। तीन प्रकारकी शक्तिया स्वीकार की है। अभिधा और कढिका उदाहरण-'कर्मणि कुशलः' कर्ममें धुशाल । ध्यञ्जनाका विषय उन्ही शब्दोंमें लिखा जा चुका है। यहां ! यहा पर कुशल शव्दका मुख्य अर्था क्या है ? 'कुश लाति पर लक्षणांका विषय लिखा जाता है। लक्षाका अर्थ ही इति कुशल: जो कुग लेते हैं वदो कुशल हैं। इसके लक्षणाशक्ति द्वारा जाना जाता है। चक्काका जो लक्षा है ' सिवा कुशल शन्दा दूसरा अर्थ है दक्ष। यह अर्ण उसीको मूल बना कर जिस शक्ति द्वारा उस मूलका, रूढार्थ है। इस रूढार्थ सिद्धि के लिये कुशग्रहणकारी अयं जाना जाता है उसी शक्तिका नाम लक्षणा है। इस मुख्य अर्थमें यात्रा पहुंचा दर लक्षणाशक्ति द्वारा हो (साहित्यद० २।११) । दक्ष, यह अर्थ लिया गया तथा इससे आसानीसे तात्पर्य काव्यप्रकाशमै लक्षणाका लक्षण इस प्रकार लिखा ! अर्थाकी भी सिद्धि हुई । फर्मविषयमें दन ऐसो अर्थ होने- गया है-मुख्या में वाधा होने पर उसका योग करनेसे से रूढ़ि वा प्रयोजन सिद्वि हो कर तात्पर्ण अर्धाका बोध प्रसिद्ध शन्द वा प्रयोजन सिद्धिके लिये जिसके द्वारा : हुआ है। दूसरा अर्थ दिखाई देता है उसे लक्षणा कहते हैं। रूढि और प्रयोजनकी सिद्धिके लिये लक्षणा स्वीकृत (साहित्यद० २ परि०)। हुई है । अर्थात् लक्षणा स्वीकार नही करनेसे रूढार्थको शब्दके सम्बन्धमें अर्पित स्वाभाविक इतर अर्थात् सिद्धि नहीं होतो गोर न प्रयोजनको ही सिद्धि होती स्वाभाविकसे भिन्न वा ईश्वरानुद्भावित शक्तिविशेप ही है। अतएव इन दो विशेष प्रयोजनकी सिद्धिके लिये यह लक्षणापवाच्य है। कोई कोई प.ह सकते हैं, कि यह लक्षणा स्वीकार की गई है। लक्षणा पण्डितों द्वारा फल्पित है, किन्तु यथार्धाम सो| _____ अभी रूंढ़ शब्दका विषय थोडा गौर कर देखना नहीं है। यह शक्ति स्वाभाविकी और ईश्वरानुद्भाविता है। चाहिये। सतयुक्त नामको रद कहते हैं। जो नाम विद्वानों द्वारा शब्दकी शक्ति कल्पित होनेसे हो वह जो प्रकृति प्रत्ययक अर्थानुसार प्रवृत्त नही होता, सभीके ग्रहणीय होगा, सो नहीं। लक्षणा, अविद्या और घ्यञ्जना अर्धाके अनुसार प्रवृत्त होता है अर्थात् जिसका व्युत्पत्ति- यह तीन शक्ति ईश्वरानुद्भाविता है। अतएव इस शक्ति से प्राप्त अर्श न ले फर समुदायका अर्थ लिया जाता है द्वारा तात्पर्शका अर्थ ग्रहण करना ही होगा, नहीं कहने उसे सङ्केतयुक्त रूढ़ कहते हैं। जैसे-गो आदि शब्द । से तात्पर्णका अर्थबोध कुछ भी नहीं हो सकता। गम् धातु डोस् प्रत्यय करके गो शन्द हुआ है, गम् धातु- 'कलिङ्गः साहसिकः कलिङ्ग साहसिक है, यह वाफ्य का अर्थ गति वा जाना और डोस प्रत्ययका अर्थकर्ता कहनेसे कलिङ्ग शब्द देशवाचक है । कलिङ्ग कहनेसे है। अतएव गो शब्दका व्युत्पत्तिलब्ध अर्थ गमनकर्ता कलिङ्गदेश समझा जाता है। कलिङ्गदेश साहसिक है, यानी जानेवाला होता है । इस अर्थ के अनुसार गो यह अर्थ सङ्गत नहीं होता। अतएव यहा पर 'कलिङ्ग शब्दका प्रयोग नहीं होता, क्योंकि ऐसा होनेसे गमन. देश साहसिक' यह मुख्य अर्थमें बाधा पहुंचाता है। यहां फर्ता मनुष्यादिमें भी गो शब्दका प्रयोग हो सकता है पर कलिङ्गको योग कर कलिङ्ग शब्दसे कलिङ्गदेशवासी तथा शयन और उपवेशन अवस्थामें अर्थात् जिस ऐसा अर्थ करनेसे भी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये जो अर्थ | अवस्थामें गमनक्रिया नहीं रहती उस अवस्थामें प्रकत प्रतीत होता है वह अर्थ क्यों नहीं लिया जायगा। अत गो-में गो शब्दका प्रयोग नहीं हो सकता ।