पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/१४८

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लखनऊ १८५७ के गदर और अगरेका चोरत्य कहानीका परि : किरण पडनेस दूर स्थानवासीको उसको चमक दिनार चय देता है। इस सुविस्तृत प्राङ्गणव समो नदीक देती है । इसक पास ही वाह और दो मसजिद हैं। दोनों किनारे स्थापित छवमखिल नामक रिप्यात प्रासाद है। मसजिदक वाच पैसरबाग नामक महल है। यहा भयो उस प्रासाद पर के सोनेका छन है उस पर सूाको यारानवशक सिहासाच्युत वशधर रहत थे। लखनऊ-सतु।

मुगल मानाज्यफे अन्तिम समयमें मी अपोध्याके। इसके ठीक पूरव शेखोंषी अधिकार सीमा थी। उहाँ गजीरप शकी प्रधानताके समय रखनऊमें राजधानी ने ही धस्नप्राय मच्छिमधन दुर्ग धनवाया था । धीरे पायम को गइ । उक मुसलमान राजर शने यथाक्रम | धीरे उस दुगक चारों ओर भावादी हो गह। मुगल रोहिलखएड, इलाहाबाद, कानपुर, गाजीपुर और इस बादशाह अक्वरशाह समय वही भावादी लखनऊ विमागमें शासन पिया था। इसके बाद सैयत् पाक कहलाने लगा। राजा टोडरमल के पैमाइश विवरणमें घ शजोंने इस उपभोग किया। इसके पहले यहा। गोमतो तीरयत्ता समृद्धिका उल्लेख है। माइन इसक ब्राह्मण और कायस्थोंका ममात्र था। मच्छिभरन दुग परा पढनस मालूम होता है, कि पहा मुसलमान साधु माफारफे मोतर रक्ष मणराला नाम उच्च भूमि की उस शेत्र मीनागाहका मरवरा था। लोग उनकी पूमा प्राचीग जनपदका निदशन है। प्रसाद है, किया। परने लिये यहा माया करते थे। उस समय यहा भयोध्या-रान रामचद्रक भाइ लक्ष मणने शेषनाग | मैकडों ब्राह्मणका वास था। सम्राट अकवरशाहने उन पवित्र तीधफे समीप अपने नाम पर लक्ष मणपुर नगर रोगों को प्रसन्न करने के लिपे लाप रूपये द कर पाज पसाया था। उस पविल तीर्यके ऊपर मुगल बादशाह पेय-यज्ञ कराय। उनके पहले यहाको कोइ विशेष मोरगजेबने एक मसजिद बनवा दा। रितु लक्ष्मण समृद्धि था। उनक उद्योगसे भीर पोछे सैयन् अली पुरकी पयित स्मृति आज भी रणनऊयासोके उदयसे पा और आसफ उद्दीलाके मध्यरसायस इम नगरको दूर नहीं हुई है। पार घारे श्रीवृद्धि हुइ थो । प्राचीन नगरमाग जहा शेख या लखनऊके शेरानादा नामक प्रसिद्ध मुसर । वर्तमान चा है, यह तथा चक्से स एग्न नगएका दक्षि मानभने ही पहले अयोध्याको जीत कर मपनी णा सम्राट स्वरशाह द्वारा बनाया गया है । इस पाक अमा: । पाडेरामनगरके पठानोंन गोल दरवाजा सिमरा उन्होन भन्याम्प स्थानो का मन सोष्टय करने के तक मुसलमान शासनदण्ड परिचालित क्यिा था। रिपे बहुन रूपये या रिपे थे। उनके पुत्र मिर्जा Vol x 36