पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२११

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लवण १६ पूर्ण न होनेसे लवण बनानेके काममें हानि होती है।, किन्तु वह जल लवणको मिट्टीसे अलग नहीं होता। ___एक जुरो दनानेमें चार कठे जमीन की आवश्यकता ८० कलसी जल में से सिर्फ ३०॥३२ कलसी जल नादमें होती है। उस जमीनमें पांच या छः हाथ गहरा, एक गिरता है। - वांकी जल मिट्टीके साथ मिला रहता है। हाथ ऊंचा और पक हाथ चौड़ा एक गड्ढा बना कर नादमें जलका गिरना बंद होनेसे मलनी लोग उस लवण एक नाले द्वारा किसी किसी नदीके साथ संयुक्त कर देने-, जलको एक दूसरी कलसीमें रख देते हैं। मादाको घली से वह जुरी नैयार होती है। बड़ी ज्वारके दिन उस नाले हुई मिट्टो चातरमे डालनेके लिये उसे दूसरी जगह रक्ष हो कर जब नदीके जसे जूरी भर जाती है, तब मलङ्गी नई लवणको मिट्टीसे उस मादाको भरने के अभिप्रायसे लोग नालेको बंद कर बडी सावधानोसे उस जलकी। पुनः नई मिट्टी छानना शुरू करते हैं। रक्षा करते हैं। वर्षाके समय जुरी वृष्टिके जलसे भर लवणको जलमें देनेके घरका नाम भुनरी घर है। वह जाती है। कार्तिक मास में वह जल फेक कर जुरीको घर चातरके पास ही बना होता है । उसकी लम्बाई २५. साफ रखते है । बाढ़के खारे जलने उसे भरना हो । २६ हाथ और चौड़ाई ७ वा ८ हाथ होती है। मलङ्गी लवण तैयार करनेका एक प्रधान उपादान है । साव मात्र ही उस घरको उत्तर-दक्षिणमें लम्बा तथा उसके धानीसे यह कार्य नहीं करनेसे सभी परिश्रम व्यर्थ जाता | दक्षिणी भागकी अपेक्षा उत्तरी भाग अधिक ऊंचा बनाते है। चातरको जुआरके जलसे सिक्त कर धूपमें सुखाने हैं। इसका कारण यह है. कि दक्षिण भागमें वे लोग का नाम 'साजन' है, कार्तिक मासमें चातर प्रस्तुत करनेसे रहते हैं, इससे अधिक ऊंचा बनानेकी जरूरत नहीं क्रमागत तीन मास उसमे लवणमृत्तिका जम सकती है । ! होती। किन्तु उत्तर भागमें लवण-जलका चल्हा वनाना' माधके शेषमें चा फाल्गुनके प्रारम्भमें उसे पुनः जुआरके | होता है, इस कारण ऊचा वनाना जरूरी है। ऊंचा नह जलसे सिक्त कर खनन न करने और उसके ऊपरकी दनानेसे उसमेंसे जो धूआं निकलना वह बाहर निकलने भस्म तथा मट्टिको निम्मी मिट्टी अलग न कर देनेसे नहीं पाता जिससे घरमें रहना कठिन हो जाता है। उसमें लवण मृत्तिका अच्छी तरह जमने न पाती। चूल्हा मिट्टीका वना होता है। उसकी ऊंचाई तोन हाथ स्वालाडीके तृतीय अङ्गका नाम म.दा है। यह मादा! होती है। उस चूल्हेके ऊपर कीचड़ देते और कीचड़ पर प्रस्तुत करनेके लिये मलङ्गी लोग र२ हाथ परिधिका और दोसौ या दोसौ पचीम मिशरीके कुन्दाकार छोटे छोटे ४॥ हाथ ऊंचा मिट्टीका एक टोला बनाते हैं और उसके | मट्टीके वरतन रख छोड़ते हैं। उस वरतनका नाम कूडी ऊपर १॥ हाध गहरा गड्ढा खोद रखते हैं। मिट्टी भस्म | है। प्रत्येक कृड़ीमें डेढ़ सेर बालू समाती है । उन बरतनों और वालुकादि द्वारा उसका तल ऐसा मजबूत कर को चूल्हेके ऊपर कीचड़ पर रखनेसे जैसा आकार वन दिया जाता है, कि जल उसके भीतर घुस नहीं सकता। जाता है वह नीचे दे दिया गया है। मलडी-लोग उसे भंट पोछे उसके तलमें 'कुड़ी' नामक एक मिट्टीका वरतन रख तथा जिस पर वह रखा रहता है उसे भंटचक्र कहते हैं। पर एक बासकी नलीसे उसका संयोग टीलेके निकटस्थ चूल्हेमें आंच देनेसे कीचड़ एक गढहसे कर दिया जाता है । उस गड़हेका नाम 'नाद'। सूख कर उस परके सभी कृडी ।३०-३२ क्लसा जल उस नाटम ममा सकता है। वरतनोंका एक पिण्ड बन जाता चातरमें लवण-मृत्तिका प्ररतुन होनेसे मलङ्गी लोग है। चार पांच या छः घंटा पूर्वोत्त कृडीके ऊपर वांसकी एक छननी और छननीके उसमें नादका लवण जल पाक ऊपर थोडा घर रखते हैं। पीछे उस मिट्टीले मादाका करनेसे दो टोकरो लवण तय्यार गढा भर कर पैसे उसको यच्छी तरह दाव देते है होता है । वह टोकरी चूल्हेकी FITrrrr और जूरीमै कलसी कलमी लवणजन उस पर ढालते घगलमें रखी रहती है। उस YTIVIVir हैं। इस प्रकार ८. कलमी जल ढालनेसे वह लवणकी टोकरोसे जो जल निकलता है - Mere महीनहर बांसकी नली द्वारा नादम आ गिरती है।। 111 TTPF - YYYY Prrrr