पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२१२

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लवण-सवणधेनु २१७ यह उसके नीचेको घास पर पह कर लवणके स्थूल | लवजलघि (स० पु०) लयणसमुद्र । (भागयत ५॥१७११) पिण्डरूपम परिणत हो जाता है। उमलणपिएडा लवणनल निधि (म0पु0) लवणममुद्र, खारे पानाका माम गाहारण है। दूमरे लणकी अपेक्षा यह बहुत ममुदा (रामायण ॥३॥६२) निर्मल होता है। कम्पनीने 'गाछारण प्रा बनाना लवणता (स. स्त्री०) लवणस्य भाय तल टापरणका यद कर दिया है। पाकिमड्डी रोग यह ल्यण भाव या धर्म लवणरसयुक्त। कम्पनाको न देवर दूसरे हाथ चुपके घेच लिया करते ज्यणतृण (T० को०) लवणरसयिशिष्ट तृण । १ तृणपिरीय, अमलोनी घास जिसका साग खाते हैं, उसको लोनियो लयणपाका एक दुसरा म पोतान है। कार । भी कहते हैं। सस्त पर्याय-लोमतृण, तृनाम्ल, पटु मानम इस पोक्तान शम्मका दो व्यवहार होता है। दो । । तृणक अरकाण्ड । गुण-मल, पाय, स्तनदुचनाक शेरो रयण पोपतान होनेसे कम्पनीके भादलदार धम्ल द्धिकर। (राजनि०)२ कुलफा नामक साग। नामक कमचारी मा र काठको मुहरकी छाप मार देते है। उस मुहरका नाम आदल है। उस भादर से हो । लवणतोय ( स० त्रि०)रषणजल, स्वणसमुद्र । आदलदार नाम पदा है। (रामा०५१५२१) त्यण पर मुहर पड नासे यह मलहीको खरीम | लवणतय ( स ० क्लो०) रवणस्य लय । तीन प्रकारके रखा जाता है। यहा एक दिन और एक रातमें यह नमका समूह-संघर, विट और सचल । सूख जाता है। पीछे मलङ्गो लोग गोलाघरकी मट्ठी पर | रयणत्य ( स० को०) लवणधर्माधित, लोणा। देर लगा कर रस देते हैं। दश या बारह दिन गोलावणद्वय ( स० को०) दो प्रकारके नमक समूह- घरमें रखने के बाद बाहर ला पर गोलाधरके सामने देर सचल और सैंधव । स्गा दी जाती है। उस देरका माम 'पहिरकाी है। यणनित्य ( स ० नि०) प्रतिदिन रयण रसास्वादनशाल। १०१५ दिन उमगाडोमें रहनेसे लवण सूट जाता है। स्पधेनु ( स० स्त्रो०) लपणनिर्मिता धेनु । गायक पोछे पोसान दारोगा मा पर यह ल्यण मरडीस घनन | रूपमें कल्पित नमश्का ढेर। इसके दामा वराहपुराण में पर लेते और उतोका एक चिट्ठा लिख देने हैं। पहले बडा माहात्म्य लिखा है जो इस तरह है -गोयरसे रिपे इसी नियमसे एयण तय्यार किया जाता था। ! स्थानम कुशके पासन पर सोरह प्रस्थ मा पr २ भसुरविशेष । सणामुर देगो । ३ राक्षस टोका रखे और उसे गायके रूपमें कपित परे । चार पिशेष! (सि०) लवणे सएट लयण ठक् (भवणार प्रस्थ और नमक पासमें रख कर उसे उस गायका पछडा उफ 1 41 ४४१२४) इति ठको लुक् यद्वा ल्यपो रसोऽस्त्य माने। फिर चार गने पर चार पै, सोपारकर स्मिन्निति अर्श माधच । ४ ल्यणरसयुक्त, नमकीन । मुद मौर सींग, चादी ग्म करपुर फल रन करदात, ५ायण्ययुक्त, सुन्दर। चीनी र करजीम, गधद्रव्य रख कर ना मानान रख लयण-घलक गन्तर्गत गएडप्राम। हर स्तन, तागा रख कर पूछ, तायके पत्तर रख कर पोड, (भविष्य महाखपट १५४५) कुश रख कर रोएं मार पांसा रन पर दोनी पल्पित स्याकिशुका (स० स्त्री०) महाज्योतिष्मनी । करे। पाछे इस धेनुफे गर्म घटी बांधे। तदनन्तर म्यणक्षार (0 पु०) लयपस्प क्षारस। सारा नमः ।। सुगध पुष्प मादि द्वारा यथाविधान पूनन परफे पणन (सं०रखी) पणार नमकीवान। इस धेशेदोयम्बर १ कर ग्रालणको दान पर स्यपपल (सं० वि०) लय जना यस्य । १रयणसमुद्र ।। ममाम्ति प्रहण, यतापातादि योग और उत्तम पारमें (जो) स्य पलं। २लयणाच जल, खारा पानी।। दान परता उचित है। रिधिपूर धेनु दान कसरी ३म्यणमिधित जल, यह पानी पिसमें नमक मिला हो। दक्षिणा सोना देना होता है। उप विधिपे मनुसार