पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२६५

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२७० लामा नोक्लिङ्ग (नुवग्लिड ), नमछी, पविया, सड लनाम। सजीव, कलास्त्र, सङ्घाट, गैरव, महारौरव, तापन, प्रता- घे सब सहारामवासी वौद्धयतिगण तिथ्वतीय पन और अवोचि नामक ८ अग्निमय तथा अर्बुद, निर. विभिन्न सम्प्रदायको आश्रय कर अपने अपने साम्प्रदायिक बुंद, सतत, हहय, उत्पल, पद्म और पुण्डरीक नामक मतको रक्षा करते आ रहे हैं। धर्मसम्प्रदायकी पृथक ताके ८ शीतमय और तद्भिन्न पृथ्वीपृष्ठ पर, पर्वत पर, मरु. अनुसार उनमे गिर पर लाल और पीली पगड़ी देखी। देगमें, उष्ण प्रस्रवण और हृदादिमें प्रायः ८४ हजार जाती है। सिकिम में जितने मन्दिर हैं उनका अधिकाश नरक निरूपित है। ये सब नरक 'लोकान्तरिक' नामसे प्रसिद्ध है। नरकसे ऊपर और सितबनसे नीचे वे प्रेत- निट म सम्प्रदायभुक्त है। केवल नमछी, तापि दिन । लोकको कल्पना करते हैं। . सिनोन और थङ मोछे सवारमिमे उदक-प तथा कि ____ लामायनियों की मृतदेह ध्यानी बुद्धकी तरह आसन और दोलित मन्दिरमें कोंक-प शाखामत विस्तारित पावैटा कर गाड़ी जाती हैं। जहां उन लोगकी समाधि देना जाता है। होती है, वह स्थान तीर्थरूपमें गिना जाता है, निम्नश्रणी- पूर्वकथित सवाराम और मन्दिरको छोड़ कर | के लामाओं की लाश जलाई जाती है । पीछे उस तिश्चतके नाना स्थानों में मन्दिर विराजित हैं । उन सव मस्म वा अस्थिको गाड कर उसके ऊपर पक पक बुद्ध. मन्दिरोमसे लामा नगरीका सुदृहत् मन्दिर ही सर्वप्रधान मूर्ति स्थापित कर देते हैं। साधारण व्यक्तिके मरने है। मन्दिरको हारसे ले कर गर्भपीठ नक जगह जगह पर किसी प्रकारका उत्सव नहीं मनायो जाता। कहाँ मोना देवमूर्ति देखो जाती हैं जिनमेंस द्वारपालो की कहाँ वे लोग लाशको पति पर फेक देते हैं। भाकृति बड़ी ही डरावना है । लामाराज्यके पश्चिमदिक- कहो कहीं लाश फेंकनेके लिये दीवारसे घिरा पति विरूपान, दक्षिण-दिक्पनि विरूधक, भूतोंको ईश्वरी हुआ समाधिक्षेत्र विद्यमान है। मङ्गोलीय लामा टेघी मूर्ति, द्वादन तानमा भूतिनी मूर्ति, वज्रपाणि मृत्ति ; पूर्वदिक पति धृतराष्ट्र तथा उत्तरदिक्पति कभी कभी मृतदेहको गाड देते हैं और यक्षेश्वर वैश्रयण , यम, अग्नि, वायु, वरुण, यक्ष, | उसके ऊपर पत्थरके टुकडे रख कर जन्ममृत्युका रक्षः, सोम, ब्रह्मा, इन्द्र और भूपति नामक दशलोक- संक्षिप्त इतिहास लिख रखते है । पर्वत पर इस .. पालमूर्ति आदि देवचित्र विस्मयकर हैं। इनके सिवा उद्देशसे लाश फे की जाती है, जिससे मांस खाने- यहां अमिताभ, अमितायु, नागार्जुन, मञ्जुश्री, सामन्त- वाले पशु पक्षी उसका .. मांस खाचे । कहीं मद्र, एकादशभिरस्क, अवलोकित, नारी, एकविंश तारा- कही वे लाशको जलाते भी है। छोटे छोटे बच्चों के मरने मूर्ति, पद्ममम्मत्र, शान्तरक्षित, अतीश, वज्रधर मरप, । पर उनके माता पिता उन्हें रास्तेको वगलमै फेक देते मिल-रः प, शाफ्यबुद्ध, अझोम्य, अमोघसिद्धि, वैरोचन, है। स्पितिमे दाह, समाधिस्थ वा नदीके जल में वहा देने. रस्नमम्मय, मरीचि या वाराहीमूर्ति, पत्रमैरवमूर्ति, हय. का नियम है। मृत्युके बाद प्रेतको मङ्गलकामनासे वे लोग मन्त्र पढ़ते हैं। एकमात्र लाल पगडी पहननेवाले प्रीवमूर्ति, विभिन्न शक्ति (काली) मूर्ति, विभिन्न डाकिनी, सामानी गे लोङ लामा हो विवाह करते हैं। यक्षिणों, गन्धर्च, असुर, किन्नर, महोरग, गरुड़ आदि तिम्वतीय बौद्धधर्मका दूसरा दूसरा हाल परित्राजक असंध्ययुद्ध, बोधिसत्त्व, वौद्धाचार्य, कुलदेवता, प्राम्य बौद्धाचार्योंकी जीवनोमें तथा बौद्धधर्म, प्रतीत्यसमुत्पाद, देवता तथा दाकिनी, भनिनी और ताग्निक हिन्दू देव- भवचक्र, भौतिकविद्या, भोजविद्या और तिम्चत शब्दमें देवी मूर्ति तिम्वतीय लामा समाजमें पूजित देखी संक्षेपमें दिया गया है। अतएव यहां पर उनका उदैलेख जानी हैं। नहीं दिया गया। लामागण पितृपुरुषों के प्रेतोदिए श्राद्ध और पिण्ड- १दलई लामा-व शकी नालिका । दामादि बड़ी श्रद्धापूर्वक करते हैं। ये लोग यमराज- संख्या। नाम] को नरकका अधिपति कह कर विश्वास करते हैं। १ दगेदुन प्रब पा .