पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३०४

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“लिट्रपूमाप्रपत्ता और लिङ्गोत्पत्तिका विषय मि श्लोकर्म यो याम और देवोंकी निन्दा तथा मिर पुराणमें मिय मिन रूपसे चणित है। यामन देर प्रतिमा (मा० हार८५ ) प्रम रहनेसे वोध होता पुराणके ६ठे अध्याय लिनोत्पनि प्रारण, लिपा है,- है कि उसके लिखे जानके पनले प्रतिमा पूजा प्रवर्तित ब्रह्माने शिवलिङ्गमृत्ति धारण पर अपनी उपासना । हुई थी। रामायण और महागारती प्रमलातीन प्रचारके रिघे शेव पाशुपत बारपन और पाली, याख्यायिका ऐतरेय (८२१२३ ) और तपशवाह्मण नाम चोर मनमाप प्रार्तित दिपे। वशिष्टपुन (१३५४४१ )में रहो या पनु राम और कृपारा शक्ति और उन शिष्य गोपायन प्रथम शैर, तपची मार नामोल्लेख न देखनेसे अनुमान होता है, कि मनुमरिता द्वाज और उनक शिप सोमाधिपति राना पम सबोंसे प्राचीन है। मनुमन्तिाय ममय देवगणको घृता पाशुपत, आपस्तम्ब और यक प्राधेश्वर नामक घेश्य हुति देनेको विधि यो। आनी तरह पुष्पन्दनलिस कालपदन, धनद और उनके शुदवणीय शिष्य इदोदर नैवेद्य यादि चढाने की प्यागी या नहीं यह नहा पपाली गए थे। इससे स्पष्ट मालूम होता है, कि लिङ्गो ! साने। जो विष्णु और शिव मनुसहिता समान पासना प्रसट्रके समय शेष मम्प्रदायमें चार शामाविमाग कारणों पद और पलके अधिष्ठाता ५४ घर पूजित थे हुआ था तथा चारों प्रधान योगियोंन यह शिभिन्न मत | रामायण, महाभारत पुराण और तनादि प्रथम डाकी प्रचार पिया। महिमा परिवर्तित हुई है: तमीमे थे परात्पर परमेश्वर स्कन्दपुगणर्म लिङ्ग शब्दको घ्युत्पत्ति ले कर लिया रूपम पूनित है। ___रामायण (१३१४२) और महाभारतके सौतिक पर्व "भामाश जिनामत्याहुः प्रथयो रम्प पीठिका।। { ७म पाया शिवलिट्ला परिय है। रानतरङ्गिणी भाजप सदेवाना नयनालिलामुख्यत ।' (१२१६४ और २०१२६ १३० ) पदनसे मालूम होता है कि (स्कन्दपुराण) जलौक (releukos) राजाके जमाम विजयेश्या नन्दो आकाश रिह और पृथिमा उमकी पाठिका है। यह शोर शेवग्येश नाम गितिक पूनाका प्रारा। मा देवताका मालय है। इमर्म मभी यको प्राप्त अतएर यह सोचार करना पड़ेगा कि रामायण रचनाक होन है इमरिये दमे रिह बहन है। एक घरमें दो लिगा पहले दीमे भारतका लिगपूना प्रचलित थी। माम पूजा नहीं करनी चाहिये , इमा प्रकार दो बार प्राम) से पहले T4 कुपन और विरोधी रासाओं ममयम भो शिरामको मा पूना निपद्ध है। शिवका निमाल्य लिहोपासनाका यथे आदर हुआ था। गुम राजामको प्रहण नहीं करना चाहिये रिमाम लिया शिवमति किमोसे भी छिपी नहीं है। उन रोगोंगी मुद्राम निर्मात्य प्राणीय है। अदित वृप निशून और शिवशति सिद्धनादिनी गादिशा लिइनमे साधारणत नियहि हो समझा प्रतिरूप ही उसका माश्य प्रदान करता है। पाता है। दशदिर महादेव दिनगन रिस रिप! यल उत्तामारत में ही नहीं, दक्षिणमारत में भी इसा शिक्षकसमें प्रारए थे तथा पो दिप्रधान भारत | अभसे पारे ५वीं सदी में लिद्गाराधना प्रचरित थी। भूमि, उनका प्रतिष्ठा और पूजा पारित हुइ थी, रिन । पायोंके यानसे जाता है कि पापपराजो रोमा पुराण, नियपुराण भीर पानोत्तरवाडमें उसका यथा मन र गगटसको समामें दृत भेजा। सामस पथ पियरण लिया है। दिमाल पार सिहल पयंत ३०ले २१४के भीतर पाण्ड्य और चोल राज्य ए हो विस्तीण भारत माम्राज्य में रहनार य पहलेसे इम | गरा। दोनों राज्य राजे रिष्तस्थापन और नियमत रिमतिकी उपासना मर्मात पोशातो। । दाक्षिणात्यसे शेयधमत्रोत ५ों सदाम परदोष मनुमदिना नियानि मदाना तथा किलिक सम्बSanmera E निमा-"The धोका उप है (मनु०६R)। उत्त प्रग्यो ३१५१५२ | lingnm may be looked upon as the phalias Not Ith --