पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३१३

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लिग क्षोभण और मारण कार्याम पिष्टमय लिंग उत्तम है। क्षत्रिय लाल मिट्टो, वैश्य पीली मिट्टो और घाट कालो वायरकान्तमणिज लिंग सिद्धिद, मौक्तिक लिंग मिट्टोसे लिंग बना कर पूजा करे। जहां ऐसी मिट्टी न सौभाग्यप्रद ; स्वर्गनिर्मित लिग महामुक्तिप्रद, राजत-लिग मिले, वहां यदि विभिन्न वर्णकी मिट्टोसे लिंग बना कर भूतिवर्द्धक, पितल और स्थज लिग सामान्य मुक्ति- पृ । करे, तो कोई दोष नही होगा । (तिलाचनतन्त्र ३५०) प्रद ; वपु आयस और सीमकजातलिग मन नाशक: लिंगका जैसा विस्तार और परिमाण शास्त्रमें पदा रिश्र अष्टधातुनिर्मित लिन ससिद्धिप्रद , अष्टनगदज्ञात है, वैसा ही विस्तार और परिमाण करना चाहिये । लिंग कुष्टरोगनाशक , चैदूर्यामणिजात लिंग शव दर्ग लिंगसे दूनी वेदो और उमका अधा योनिपीठ करना नाशक ; स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद है। उपयुक्त ध तु) होगा। लिंग अंगुष्ठ प्रमाण फा होगा। किन्तु पापाणादि और द्रव्यादि द्वारा शिवलिंग बना कर पूजा करनेसे वे लिंग मोटा बनाना होगा । रत्नादि धातु निर्मित लिंग- सब फल लाम होते है। का परिमाण अपने इच्छानुसार बना सकते हैं। ___ पहले जिन सब लिंगपूजाची बात लिखी गई उनमेने लिग मुलक्षणयुक्त करना होता है। अरक्षण लिंग ताम्रनिर्मित लिग रेत्य, मीसक, रक्तचन्दन, शह यात्य, अशुभकर है, इस कारण उसका परित्याग करना उचित लौह और सोसक निर्मित लिगको कलिकालो पृजा है। लिंगकी लम्याई कम होनेसे शत्रुको वृद्धि होती नहीं करनी चाहिये। है। परिमाणको घटाना वढाना उचित नहीं । योनिपीठ पारेका शिवलिङ्ग बना कर पूजा करनेसे महा पश्चर्या तथा मस्तकादिदीन करके लिंग न बनाये ! इसमे अनेक लाभ होता है। प्रकारका अमंगल होता है। पार्थिव लिगमें स्वांगुष्ठपर्म लिइ वना कर पोले उसका संस्कार करके पता का लिग चना कर पूजा करे। (मातृकामेदत० ७ १०) करनी होती है। क्षेवल पार्थिव लिडमा संस्कार नही - सिर्फ एक लिंगकी पूजा करनेसे देव और देवो दोनों करना होता है। निम्नोक्त प्रणालीके अनुमार संस्कार की दी पूजा हो जाती है। लिगके मूल में ब्रह्मा, मध्यदेश में करना चाहिये । रौप्य वा स्वनिर्मित लिंगको स्वर्णपात्र त्रिभुवनेश्वर विष्णु, ऊपरमें प्रणयाप्य महादेव अवस्थित में तीन दिन दृधमें रख देना होगा। गोछे 'ताम्य है। लि गवेदी महादेवी है और लिंग हो साक्षान् महेश्वर यजामहे इत्यादि मन्त्रसे स्नान करा कर कालरुटकी हैं। अतएव लिंगपूजामें सभी देवताओं की पूजा या जाती पीछे वेदी पर पोडशोपचारसे पार्वतीकी पूजा करना है। (लिन्नपुराण) उचित है। इसके बाद उस पानसे लिंगको उठा कर पारद-गिर्शगपूजाकी विशेष प्रशसा देखने में आती गंगाजलमें तीन दिन रप देना होता है। अन्न्तर यथा । है। जय पारेका लिंग बनाया जाता है, तब नाना विधि संस्कार अर्थात प्रतिष्ठा करके वह लिंग स्थापन प्रकार ग्रिन होने की सम्भावना रहती है। इस कारण करना होगा। उस समय शान्ति स्वस्त्ययन करना आवश्यक है । पकार पार्थिव शिवलिंगपूजनमे १ या २ तोला मिट्टी ले कर शव्दसे विष्णु, आकारसे कालिका, रकारसे शिर और उमीसे लिंग बना कर पूजा करनी होती है। दकारसे विष्णु समझे जाते हैं। सतण्य पारद शब्दले "लिङ्गप्रमाया देवेग कथरस्य मयि प्रभो। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर और कालिका इन तीनों का ही बोध पार्थिवे च शिखादी च विशेषो यत्र यो भवेत् ॥ होगा। इसलिये ब्रह्मविष्णु शिवात्मक पारद लिंगको - मृत्तिगतोलक वाह्यमयवा तोलाद्वयम् । जो पूजा करते हैं वे शिवतुल्य हैं तथा धन, ज्ञान सौर - एतदन्यन्न कुर्वीत कदाचिदपि पार्वति ||" अणिमादि ऐश्वर्यलाभ करते हैं । जीवनकाल में एक दिन (मातृकाभेदतन्त्र ७ पटल) भी पारद लिंगकी पूजा की जाय, तो भी ऊपर कहे गये पार्थिव लिंगपूजनमें मृत्तिकाभेदकी व्यवस्था देखने- समरत फल प्राप्त होते हैं। में आती है। लिंग बनाते समय ब्राह्मण-सफेद मिट्टी, I , जिन सब लिंगोंकी वात कही गई, उनका लिंग-निर्माण