पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३१५

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३२० लिन पार्थिव लिङ्गपूजा-पार्थिव लिङ्गपूजामें पद्दले लिङ्ग मुद्रा दिला कर आवाहनादि करने होते है । पीछे 'ओम् निर्माण करना होता है। दो राय नमः' इस मन्त्रसे | शलपाणेद नुप्रतिष्ठिनो भव' इस प्रकार लिग प्रतिष्टा एक या दो तोला मिश्रा ले। पीछे 'यो महेश्वराय नमः पर 'यो गुपतये नमः' इस मन्वसे तीन बार गिर कह यगुष्ठ परिमित लिग बनाये । “मट्टीको नीन मस्तक पर जल चढाये। चादरे शिवक मरना परका समान भाग करके ऊपरी भागमे लिङ्ग, मध्य भाग वज़ फेंक कर उनसे ऊपर वार बानप तल ( मरवा गौरोपीठ तथा शेष भाग द्वारा बेदी अर्धात् सासन चावल ) दे दे। इसके बाद पाधादि दशोपचार सारा पूजा प्रस्तुत करना होता है। ऊपरी भागको लिग, मध्यमाग करनी होती है। 'ओं पतत् पायो नमः शिवाय नमः। फो गोरीपीठ और निम्न भागको वेदी फहने हैं। बाएं मयं नो नमः शिवाय नमः" इत्यादि ग्रामसे या दहिने किसी भी हाथले लिग बना सकते हैं। एक पाय, अर्य, आचमनीय, मधुपर्क, स्नानाय, गन्य, पुष्प, हाथ लिंग बनाना हो उत्तम है। नितान्त असमर्थ होने , बिल्वपत्र, धूप, दांप और नैवेद्यादि देने होंगे। शिरक पर दोनों हाथले भी बनाया जा सकता है। इस प्रकार अर्यमें केला और विल्वपत्र देना होता है । पोडे शियकी बना फर लिंगके ऊपर एक गोल छोटा मिट्टाका टुकड़ा अए मू की पूना करनी होती है। पूर्वको मोर-पते रख देना होगा। इसका नाम वन है। यदि कोई दूसरा गन्यपुग्पे ओ मर्याय नितिमृर्तये नमः' इशानकोण में 'पने याटमो लिग बना दे, तो पूजक शिबके गाल पर दाय गन्धपुष्पे ओ भवाय जलमूर्तये नमः' उत्तर में पते गन्ध. रग कर 'यो हराय नमः' और 'ओ महेश्वराय नमः' यह पुपे यो सद्राय अग्निमूत्तये नमः गयुकोणमें 'एते गन्य. मन्त्र पढे । पूजाके समय शिवलिंगका पिणाक उत्तरको पुपे यो उपाय वायुमूर्तये नमः' पश्चिममें 'एने गन्ध- ओर करके बिल्वपत्रके ऊपर रखना होता है। सामान्य पुप्पे भो भीमाय माझामनये नम नै तमें एते गन्ध पृजा-विधिके अनुसार आशनशुद्धि, जलशुद्धि, गणेशादि पुपे ओं पशुपनये यजमानमूर्तये नमः' दक्षिणमें पते देवताकी पूजा कर लिग पूजा करना होगी। पूजा गन्धपुष्पे ओं महादेवाय सोममूर्तये नमः' अग्निकोणमें के समय ललाटमें भस्म वा मृत्तिकाका त्रिपुण्ड और 'एते गन्धपुष्पे ओ ईशानाय सूर्यामूर्तये नमः' इस प्रकार गलेमे रुद्राक्षमाला पहननी चाहिये। अष्टमूर्तिकी पूजा करके यथाशक्ति जप और गुहातिगुह्य अनन्तर शिवका ध्यान करना होगा | ध्यान इस मन्त्रसे जप और विसर्जन करना होगा। पीछे दाहिने प्रकार है- हाथका वृद्धांगुष्ठ और तर्जनी मिला कर उसके द्वारा "यों ध्यायेन्नित्य महेश रजतगिरिनिम चारचन्द्रावतस वम् वम् शब्दसे दहिना गाल यजाना होता है। इस रत्नास्लोज्ज्वलाज परशुनृगपराभीतिहस्त प्रसन्नम् । समय महिम्नः रतब मादिगिका स्तवकवन पढ़ना पद्मासीन समन्तात् स्तुतममरगयाक्प्रकृत्तिं वसान आवश्यक है। असमर्थ होने पर श१ श्लोक भी पढ़ विवाद्य विश्ववीज निखिलभयहर पञ्चवस्त त्रिनेतम् ।" सकते हैं। यह ध्यान पढ़ कर मानसोपचारसे पूजा करे और इसके बाद प्रणाम करके दहिने हायसे नळजलसे पीछे ध्यान पाठ करके शिवके मस्तक पर फूल रखे। और आत्मसमर्पण करके गियके मस्तक पर थोड़ा जल अनन्तर 'ओं पिणाकधृक् इहागच्छ, इहागच्छ, इह तिष्ठ, चढाने! इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि, इह सन्निधेहि, इह सन्निद्धाख, | इस प्रकार आत्मसमर्पण परके कृताञ्जलि हो क्षमा इहसन्निरुद्धास्व, अलाधिष्ठानं कुरु मम पूजां गृण ।' प्रार्थना करनी होगी। इसी प्रकार आवाहनादि करे। आवाहन आदि पांच "मों आवाहनं न जानामि न जानामि पूजन । विसर्जन न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥"

  • "विना भस्मत्रिपुपण बिना रुद्राक्षमालया।

इस प्रकार क्षमाप्रार्थना करके विसर्जन करना होता पिना मालरपणा नार्चयेत पार्थिव शिवम् ॥" है। ईशानकोणमें जलसे एक त्रिकोणमण्डल बना कर - -