पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३१९

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लिगायत ३२४ लिंगके सिवाय विभूति और रुद्राक्ष ये ही शेवचिह ।' कोई भिक्षुक हाथ और पैरमै घण्टी बांध कर इधर उधर धारण करते हैं। चूमता फिरता है । गृहस्थ लोग उस घण्टीकी आवाज़ इस सम्प्रदायमें स्त्री पुरुप दोनोंको गुरुपद छनेका | सुन कर उसे अपने घर बुलाते और रास्ते पर ही आ अधिकार है। दीक्षाके समय गुरु शिष्यके कानो मन्त्र कर मीख दे जाते हैं। कहीं कही इस सम्प्रदायका एक देने तथा उनके गले या हाथमे लिंगपूर्ति घांध देते हैं। एक मठ है। इस मठमें बहुतेरे परिचारकस्वरूप रहते गुरुके लिये मास साना नया शराव और नम्बाकू पीना | हैं। मठके मालिक वहुत-से चेले रखते और मरनेके निपिद्ध है। समय उनसे एकको अपना उत्तराधिकारी बना वासव अपने सम्प्रदायमें विधवा-विवाह प्रचलित कर जाते हैं। गये हैं। इस विधवाविवाहकी क्रियापद्धति खतन्त्र है। ____ दक्षिण-भारतके कर्णाटकप्रदेशमें यह धर्मसम्प्रदाय इसमें कोई विशेप खर्च नहीं है। पालके ५) या १०) रुपये प्रादुर्भूत हो कर क्रमशः महाराष्ट्र, गुजरात, तमिल और विधवाको देनेसे ही सम्बन्ध ठीक हो जाता है। इस तेलगु देशों में फैल गया है। किन्तु आर्यावर्त्तमें इस समय विधवा कन्याको खामी घरसे पिताके घर आ सम्प्रदायकी वैसी प्रधानता नहीं है। लेकिन काशी नर विवाह करना होता है। गांवके अध्यक्षोंके लडकेकी आदि प्रसिद्ध शैवतीर्थो में कही फहीं इस साम्प्रदायिक पहली शादीमें २००) रु. खर्च होता है, किन्तु यह लडका साधुओंका समागम देखा जाता है। इस सम्प्रदायकी. यदि विधवाविवाह करे, तो ५) से ले कर १००) रु० तक दूसरी कोई एक शाखा वैद्यनाथ आ कर बस गई है। वे खर्च होता है। इस विवाहका उद्देश्य अच्छा रहने पर मी जटाजूट वाध र साँढ़को साथमें ले घूमते फिरते है। उस देशम पचलित बहुत-सी कुत्सित प्रथाओंने इसे और इस देशके अधिवासी इस चैलको वैद्यनाथका सांढ भी घृणित कर दिया है। दक्षिणापथके दक्षिण पश्चिमा. कहते हैं। ञ्चलम विवाह के बाद स्त्री अपने स्वामीके साथ सहवास न कर इच्छानुसार दूसरे दूसरे पुरुपों पर आसक्त हो तेलगु कनाडी आदि भाषामें इस साम्प्रदायिक जाती है। जंगम लोग भी इस घृणित प्रथाको अनुसरण मतके वहुनले प्रन्ध विद्यमान हैं। मेकेंजो साहवकी करते हैं। संगृहीत पुस्तक-तालिकामे वासवेश्वरपुराण, प्रभुलिङ्ग वासव शवदाहकी प्रथा परित्याग कर अपने साम्न- लीला, स्मरणलीलामृत, विरकास काध्य आदि ग्रन्थका दायिकोंके दफनानेकी व्यवस्था कर गये हैं। इसके साथ परिचय मिलता है। उत्तर-पश्चिम भारतमें नीलकण्ठ साथ सती होनेको भी प्रथा है। सती होनेमें जीवित स्त्री रचित वेदान्तसूत्रभाष्य हो इस सम्प्रदायका एक प्रामा- गाडी जाती है। तीर्थयात्रा निषेध तथा जीवित समाधि णिक ग्रन्थ है। आदि उनके चलाये बहुत से का नियमों और कठोर ___मतप्रवर्तक वासबके उपदेशानुसार- जातिभेद, उपदेगोंके पालन करने में अशक्त हो कर उनके सम्प्रदायी स्त्री-भेद, ब्राह्मण क्षत्रियभेद तथा वेदादि शास्त्रोक्यको शिव अब उसका पालन नहीं करते, वरं वे लोग आज प्रामाण्य नहीं समझने पर भी उनमें सचमुच जातिगत, पल शिवरात्रि व्रत करते और श्रीशैल, कालहस्ती आदि सम्प्रदायगत और समाजगत या वाणिज्यगत नाना प्रसिद्ध शैवतीर्थों में जाते हैं । दाक्षिणात्यके किसी किसी पार्थक्य देखा जाता है। शिवमन्दिरके वे पुजारी है। काशीमें केदारनाथ लिगके धर्मप्रवर्तक वासबके आदिष्ट उपदेशका पालन पण्डे जंगम हैं। पुरोहितोंकी जंगम उपाधि होनेसे ही करते हुए इन्होंने जातिगत और समाजगत अथवा सम्प्र. माम्प्रदायिक लोग जंगम कहलाते हैं। बनारस में जहां गम कहलाते हैं। वनारस में जहां दायगत सव मेद-ज्ञान ही विसर्जन कर दिया है। आर्य- वे लोग रहते है, वह जगमघर कहलाता है। ऋपियोंके आदिमर्मग्रन्थ ऋग वेदादि संहितामें इनकी बनेरे मीन माग कर अपना गुजारा चलाते हैं। कोई | जैसा विश्वास नहीं है, ब्राह्मणों के प्रति भी इनकी वैसा