पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३२३

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लिच्छविराजवंश ३२९ ज्ञानवोर तीर्थडर पद्धदेवका आविर्भाव होने तथा लिच्छिविगण साधारणतन्त्र प्रिय थे। किसो किसी उनके साम्यवादसे जनसाधारणके ब्रह्मण्य-धर्मके प्रति बौद्धप्रन्यौ 'वति' राज्यको १७०७ छोटे छोटे राज्यों में आल्याशून्य हो जानेसे वैदिक और स्मार्च ब्राह्मण सभी विभक तथा अधिपतियों को स्वाधीन बताया है। वाहरके लिच्छवि जातिके ऊपर विढे पभाव दिखलाते थे। उसी शत्रुके आने पर ये सभी मिल कर ऐसा सिंहनाद करते कारण उन लोगोंने परवचीकालमें लिच्छवि-शासित थे, कि उससे समस्त उत्तर-भारत स्तम्भित हो जाता मिथिला अशका 'वर्जितराज्य' नाम रखा था । लिच्छवि था। इस कारण मगधके परम पराक्रमी सम्राटोंको भी भक्त पालिप्रन्थकारगण मानो उसके उत्तर चर्जितराज्यकी उनके साथ विवाद करनेका साहस नहीं होता था। भिन्नरूप नामोत्पत्ति स्वीकार कर गये हैं। पालिअन्यके सम्मिलित लिच्छविराज्यके शासनविधि-स्थापनके लिये मतले जिस ऋपिने पृजावलोकी पुदतन्याको ला कर वैशाली नगर में एक महासभा थी। वह महासमा जो लिच्छवि नाम रखा था, कुछ दिन बाद उनका प्रतिपालन फैसला कर देती थी, उसीके अनुसार हजारों छोटे छोटे करना कप्टजनक समझ कर उन्होंने दोनों बच्चों को एक लिच्छवि-राज्य सुशासित होने थे। गृहस्थके हाथ सौंप दिया । वह गृहस्थ वडे यत्नसे उन- लिच्छवि समाजके इतिहासको आलोचना करनेसे का लालन-पालन करने लगा । बडे होने पर दोनो शिशु मालूम होगा, कि उनमेले कोई जैन, कोई बौद्ध और कोई दूसरे दूसरे वालक और बालिकाके साथ खेला करते थे। पूर्वपुरुषाचरित ब्रह्मवादी थे। लिच्छवि पितृमातृदोन था, इस कारण उनके साथी उन्हें मगधपति विम्बिसारने बैगालोके लिच्छविराजकुलमें 'यजितन्य' अर्थात् वर्जित कह कर पुकारते थे। आगे विवाह किया था । बुद्धदेवने मगधंगतिको 'सेवन' चल कर उस 'जितव्य' के चंगधरोंने ३०० योजन नामक एक बड़ा हाथी और अष्टादशरले खचित एक विस्तृत एक पराक्रमशाली राज्य बसाया । वही राज्य लड़हार दिया। विम्बिसारने वह हाथी और हार अपने 'जि' (अर्थात् वर्जिन) कहलाने लगा था । वही मिथिला- थला प्रियतम छोटे लड़के वेहल्ले को दे दिया था। इस पर उन राज्यका अधिकाश है। के बड़े लड़के अजातशलु पिता और छोटे भाईके प्रति लिच्छवियोंको एक शाखा वैशालीमें, एक नेपाल प्रान्त मिथिलामें और एक पुष्पपुर वा पाटलिपुत्र अञ्चल बड़े असन्तुष्ट हुए थे। उसीके फलसे बुद्ध निर्वाणके मे फैल गई थी। वैशाली शाखामें महावीर स्वामी और ८ वर्ष पहले पिताका काम तमाम कर अजातशत्रुने मगध नेपाल प्रान्तकी शाफ्य-शाखामे बुद्धदेव आविर्भूत हुए थे। का सिंहासन कलङ्कित किया । आत्मरक्षा करनेके लिये मनुसंहितामें यह जाति व्रात्य अर्थात् संस्कारहीन क्षत्रिय वेहल्लने वैशालीमें जा कर मातामदके कुलमें मानय कह कर चिहित होने पर सभी प्राचीन जैन और बौद्ध- लिया। अब जातीय एकतासूत्रमें सम्मिलित मातामह- प्रन्धोंसे उनके उपनयन संस्कारका परिचय पाया जाता कुल पर किस प्रकार शासन करेंगे, अजातशलु इसी है। आज भी सैकड़ों प्राचीन युद्धमूर्तिमें यज्ञोपवीत ऊहापोहमें पड़ गये । वौद्धोंके महापरिनिर्वाणसूत्र में लिखा चिह्नित है। परवर्त्तिकालमें भो नेपालके प्रवल परा- है, कि निर्वाणके कुछ समय पहले वुद्धदेव जब राजगृहके क्रान्त लिच्छवि राजगण विशुद्ध क्षत्रिय कह कर ही परि- निकटवत्तों गृध्रकूट पर्वत पर रहते थे, उस समय मगध चित हुए हैं। इससे अनुमान किया जाता है, कि मनु- राज अजातशत्रुने अपने प्रधान मन्त्री विश्वाकरको वुला संहिता-रचनाकालमें लिच्छविगण व्रात्य क्षत्रिय कह कर कर कहा था, 'मन्विन् ! आप भगवान्के पास जाश्य निर्दिष्ट होने पर भी तत्परवत्तींकालमें संस्कारादि द्वारा और उनसे कह दीजिये, कि मगधराज प्रवल पराक्रमशाली विशुद्ध क्षत्रिय हो गये थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो लिच्छवियोंको समूल उत्पाटन करेंगे। भगवान इस पर अश्वमेध यशकारी परम ब्राह्मणभक्त गुप्तसम्राट् समुद्र- क्या कहते हैं, उसे अच्छी तरह सुन लेना और हमसे गुप्त अपनेको लिच्छिवि राजकन्याके गर्भजात कह कर आ कर कहना । मेरी वात अन्यथा होनेको नहीं।' गौरवान्वित न समझते। मन्त्रिवर बुद्धके समीप गये और उन्हें प्रणाम कर