पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३३७

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३४२ लुगडी-लुधियाना टएदी (० स्त्री०) लपेटे हुए सूतकी पिडी या गोलो 1 | ७६.७४ पृ०के मध्य अवस्थित है। भूपरिमाण १४५५५ जिसकी पूछ या पर झड गये हों। वर्गमील है। इसके उत्तर शतद्र नदी, पूर्वम अम्बाला न नरा (हिंवि०) २-इधरकी उधर लगानेवाला; चुगल जिला, दक्षिण में पतियाला मिन्द, नाभा और मालेर खोर । नटखट, शरारतो। कोटला मामन्तराज्य नथा पश्चिममें फिरोजपुर जिला उतरी (हिं० वि० स्त्री०) भगडा लगानेवाली, चुगल है। सरमाला, लुधियाना और जगगाँव तहमाल ले बोर। कर यद जिला बना है। दुनम ( २० पु० ) १ कृपा. मेहग्वानी । २ भलाई, रवी. इम जिलेकी भूमि सर्वत्र समनल है, किसी भी स्थान उत्तमता । ३ मज़ा, बानन्द । रोचता। ५ स्वाद, जायका पर वहा पहाड़ दिग्द्राई नहीं पड़ता। यहां कोई लुज-चीन और भारत सीमानवासी पहाड़ी जाति नही न रहने के कारण जलका बहुत कष्ट है । दहिणी विशेष नौकियां नामक स्थानले पश्चिम लुइङ्ग नामक सीमा पर शत नदीकी एक प्राचीन साई है, उसके पास स्थानमें इन लोगोंका वाम है। आचार-व्यवहारमें ये पासकी भूमि कुछ उर्वरा है। वर्षा ऋतुमें विशेष वर्षा लोग विलकुल बर्वर हैं। यहतेरे काठकी ग्वटी गाड होनेसे यह ग्बाई भर जाती है, किन्तु प्रीम ऋतुमें जलके दर घर बनाने है। वाद्याहि सन्बन्धमें ये लोग को अमावसे दिलकुल खुम्ब जाती है। अम्बालाले ले कर विचार नहीं वरने । साधारणात. वे बीता वाघ, दररे. सरहिन्द ग्वाल तर पानीमा अभाव कुछ दृर हुआ है। सियार आदि जानवर्गके चमडे से अपना शरीर हमने इम ग्वाईको दो शासा, जो इस जिलेके पश्चिम परगने- हे। योद्धाओंका चर्मवर्म हो साज है। रिन्तु गृहस्थ के सामने यहती हैं, ग्वेनीगरीके लिये बहुत मुविधा पहुँ। और जातीय सरदार सूती कपडे पहनते है। जो लुदज़ चाती है। जिले के अधिकांश माग वालुकामय मभूमि- ईसाई हो गये हैं, वे चीनबासीके जैसे कपडे पहनते है। के समान हैं। यही नहीं हरियाली नजर आती है। ये लोग यास पालकी दुसरी दुसरी जातियोंसे इस प्रदेशमें घना जंगल नहीं है। शतद्र के प्राचीन अधिक काले होते हैं। शिर पर चीनवासीकी तरह बडे। गर्भके समीपयत्ती वेत विभागके सिवाय और कहीं भी -बड़े वाल रखते हैं। गुद्धकार्यमें वे बढे निपुण है। बडे बडे चम दिगई नहीं पडते, सिर्फ मागेमें तलावों- पार्श्व वत्ती देशवासियोंको विशेषतः युन-नान जातिको । के तट पर एक एक यगोग योर वटवृक्ष दिवाई पड़ते बे उधम मचानेके लिये हमेशा उसाडा करते हैं। बड़ा हैं। बड़े बड़े लोंके अमावको दृर करनेके लिये सड़कों- छुरा, जुटार और धनुर ही इनका एकमात्र अस्त्र है। के दोनों रिनारे दक्ष लगाये जा रहे हैं। यहां जगह जगह आनाम सीमान्तस्थित खामती जातिकी वासभूमिले वे पर केकडे दिखाई पड़ते है। वहांके लोग उनका चूना लोग उक्त अनादि लाते हैं। चीनराजको ये कर नहीं बना कर बेचते हैं। वर्तमान लुधियाना नगर १५ सी देने और न अपनेको गजगतिक वशीभूत हो समझते हैं। वर्ष पहले इस तरह गठित नहीं था। किन्तु इस जिले- पर हा, वीनराजके आदेश पानेसे वे तुरत युद्धके लिये के दूसरे दूसरे नगरोंका नएडहर देग्दनेसे मालूम होता नैयार हो जाते हैं। इन लोगोंमें प्रार. १२ सी दुर्द्ध है, कि एक समय यह ग्वूव प्रसिद्ध था । वर्चमान लुघि योद्धा है। भूतादिको प्रसन्न करने के लिये ये मुर्गाको याना नगरके समीप ही शुनेन नामक स्थानमें ईट और चलि देते हैं। पत्थरोंके बने अट्टालिकाटि पूर्ण एक प्राचीन नगरका लुदरा (हिं पु० ) एक प्रकारका धान ! यह अगहनके ध्वंसावशेष नजर आता है। ये ध्यंसस्तग्मादि आज महीने में तैयार होता है और इसका चावल बहुत दिनों मो इस नगरको प्राचीन समृद्धिका परिचय दे रहे हैं। तक रह सकता है। भारतमें मुसलमानी आगमनसे पहले ही यहां के गौरव -पक्षाब प्रदेगा, अन्तर्गत एक जिला। यह तथा कीर्तिकलापादि धीरे धीरे नष्ट हो चुके थे। यद्यपि ३०३४ से २१ तथा देशा० ७२ २२ से' आज प्राचीन हिन्दू राजधानी मत्स्यबाट नगरका सौन्दर्य