पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३४१

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लरी-जुसाई पर्वतमाना उत्पीडन सय करना नहीं चाहती। यदि कोई राजा । लु लाय ( स० पु० ) महिप, भैसा। उन पर बलप्रयोग करे चे उसी समय उनसे लड़ाई ललित (स त्रि०) ल ल क । आन्दोलित, लटकता करने तय्यार हो जाते हैं। वालनीच प्रासाके मध्य | या झूलता हुआ। २ विकीर्ण, चारों ओर फैला या ठित प्रायः ४ हजार लोगोंका वास है। वे लोग धडे अत्या- | राया हुआ। ३ व्याप्त । ४ न्लान, थका हुआ। ५ उन्मू- चारी और दुद्ध होते हैं। पार्श्ववत्ती देशवासियोंको लित, उबाडा हुआ। ६ राण्डित, टुकड़ा किया हुया । ये हमेशा तंग किया करते हैं। ७ विध्वस्त, नष्ट किया हुआ । पुस्त इ-कोइ वा जाग्रास शैलवासी लुर जातिकी | लुबाना-मध्यभारतमें बसनेवालो कृपिजीवो एक जाति । एक शाखा फइली कहलाती है। उन लोंगोंके मध्य | हल जोतना तथा अनाज वुनना, रोएना, काटना और खुर्द, दिनारवेद, सुहोन, फलहर वदाई और मकि नामक ] ढोना इसका प्रधान कार्य है। यह जाति गुजरात प्रदेशसे कई विभाग हैं। खुजिस्तान प्रदेशमें भी फेइलो जातिका | आ कर दक्षिण-भारतके नाना स्थानोंमे तवा पाव वास है। ऐतिहासिक रलिनसनके मतसे इस जाति- विभागकी इरावती नदी के तट पर बस गई है। इस में १२ हजार गादमी है । पुप-कोह और पुम्त इ कोह। जातिके लोग शान्त और निर्विरोध होते हैं तथा शूट वासी नासो उकैन हैं। उन लोगोंके उपद्रवसे भ्रमणकारी, श्रेणीमे गिने जाते हैं। ध्यवसायी अथवा तीर्थयात्रिगण गमनागमन करने नहीं लश (सपु० ) मृटमन्तद्रा एक मृपिका नाम। पाते। पथिकके पास एक कौडी रहने पर भी वे उसे | इन्होंने १११.५३६ सूक्त सकलन किया। वेधडक छीन लेते हैं। कभी कभी उसे यमपुर भेज कर ल गई (हिं. स्त्रो०) एक प्रकारको चाय जो आसाम हो निश्चिन्त होते हैं । सारे लुरिस्तानमें प्रायः ५ हजार और कछारमें होती है। घुडसवार ओर २० हजार बन्दूकधारी सेना हैं। यह सव ल शाकपि ( स० पु०) एक प्राचीन ऋषिका नाम | पहाडी सेना जरूरत पड़ने पर एकत्र हो कर आततायी (पञ्चविंश वाराण १७१४३) पर आक्रमण करती है। | लु पभ (सं० पु. ) रोपतीति रुप हिंसाया (स्पेन्निल्लुपच । ___ फेडलि लोग वत्तियारोंकी तरह नर रक्तसे पृथ्वीको उगा २।१२४ ) इति अभच, लु पादेशश्व धातोः। मत्त. कलुपित करना तथा पापपडू में लिप्त होना नहीं चाहने । हस्ती, पगला हाथी। वे वहुत कुछ सभ्य और दयाल होते हैं। पेप कोह लुमाई पर्वतमाला --भारतवर्ष के उत्तर-पूर्व सीमान्तस्थित और पुस्त-इ-कोद पर्वतवासीको छोड कर बुरुजिल और एक पार्वत्य प्रदेश । यह प्रदेश आसाम प्रदेश के किनारेके खोरेमवादके मध्यवत्तीं हुक प्रान्तरमें चजिलान और जिलेके दक्षिणसे चट्टग्राम जिलेको पूर्वी सीमा तक फैला बेहरानेवेनेद नामक दो जातिका वास है। वह लेक हुआ है। इस पार्वत्य-विभागके पूर्व, ब्रह्मराज्यके अन्त शाखासे उत्पन्न हुई है। गत एक बहुत विस्तृत पर्वतमय भूखण्ड है । उस भूखण्ड लरी (हिं० स्त्री० ) वह गाय जिमे बच्चा दिये थोडे हो मे किन जातियोंका वास है; आज तक पता नहीं चला दिन हुए हों। है। कोई भी भ्रमणकारी उस वनमालापूर्ण तथा वन्य ललन (सं० पु०) आन्दोलित होना, झूलना! जतुस कुल पात्यपथसे अपरार हो कर उन दुई ल लाप ( स० पु० ) लन्यते इति ल ल विमर्दने भिदा | पार्वतीयगणके साथ मिलनेका साहस नहीं करते। दित्वात अड, ललां आप्नोतीति आप अण । महिप, भैसा। इस लु साई पर्वत पर कई तरहकी अंगलो जातियां लु लापकन्द (नपु० )लु लाप्रियः कन्द, मध्यपदलोपि । वास करती हैं। इनमें बलवीर्यसम्पन्न कुकी तथा लु साई कर्मधा० । महिवकन्द, भैसा कंद। जाति सवसे अधिक साहसी हैं । वे लोग अंग्रेजीराज्यके ल लापकान्ता (सं० स्त्री० ) लु लापस्य कान्ता । महिपो, विरुद्ध अस्त्र धारण करने में भी नहीं डरते । कुको जातिके वन्य-विक्रम तथा तोरोंके अभ्यर्थ सन्धानका परिचय