पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३४६

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लुता ३५१ कपिराये काटनेसे काटा हुआ स्थान तांबडेरगा। इसमें भी करे । श्यामा रता, बसका जड, मुलेठो हो जाता है। चा गड जाते हैं वे,चस्ते फैनते नहीं। चन्दन, उत्पल, पद्मकाष्ठ और श्लेप्मातकका त्वद इन सब मस्तक भा। मालूम होता, जलन देती है तथा तिमिर का प्रयोग करनेसे बहुत लाभ पहुचता है। क्षौरपिपलो रोग और भ्रम आदि उपद्रव होते हैं। इसमें पद्मकाष्ठ मा सभी प्रकारके ल नायिपमें विशप उपकार ।। कुछ, इलायची करा अर्नुनक्षा छिठा, अपामार्ग, असाध्य लू ताविपका विषय इस प्रकार कहा गया दूर्गा, ग्राहो और शालपणों पे सव द्रव्य एक्ल परिमित है। सीवर्णिाके काटनेसे काटा हुआ म्यान सुज माता मावामें सेवन करे। है। उसमेंसे फेनयु मामिषगविशिष्ट आस्राव ____ अलिविपके काटनेसे लाल लाल चक्त्ते निकलते हैं।, निकलता है तथा अतिशय श्वाम कास, ज्वर मूर्छा मोर उन चकत्तोंम सरसोंके आकारके फोडे निकरते है तथा तृष्णा आदि उपहर होते हैं। जारिनीका दशन अतिशय ताशाप और दाह ये दोनों उपद्रव होते है। इस भयानक है। यह स्थान फट जाता है और उसमें बहुत प्रियट्स, कुछ, खसको जड, अशोक अतिथला सोयो, जलन दता है । स्तम्भश्वास, अतिशय तमोदृष्टि और पिप्पली, वटका व कुर इनका एकल प्रयोग करे। । ताल शोष आदि उपद्रव होते है। मूत्रविपके द्वारा काटा हुआ स्धान सह कर धीरे धीरे एणोपदके दशको भारति कृष्णतिल मी होती है। इसमें फैल जाता है। उसमेंसे काला रक्त निकलता है। कास | तृणा, मूर्छा, या यमि और काम यादि उपद्रव दिखाइ शाम, मि, मूा, ज्यर और दाह यादि उपद्रव होते देते हैं। काकाण्डाके काटनेसे काटा हुमा स्थान पापड है। इसमें मैनसिल, इलायची, मुलेठो, पुष्ट चन्दन, ' और लाल हो जाता है। उसमें पहुत जलन देती है, पद्माष्ठ, मधु और स्वसकी जडका एक्त सेवन करे। । चारों गोर फट जाता है तथा दाद मूर्छा अदि उपदार रतलूनाफे विपसे जलने देती और लोदयुक्त पाण्ड । होते है । व पोटेनिकलते हैं। उसका भीतरी भाग रतयक्ता अमाध्य लूनाविपको चिकित्सा करते समय चिकि लार हो जाता है। इसमें अतिपला, चन्दन पसकी सफो चाहिये, कि उसका दोप और प्रकोप अच्छा जड, गमकाप्ठ तथा अर्जुन शेलूर मामडे का छिलका तरह जान ले, वितु सभा भवस्थाओं में छेदन करना एक्स र प्रयोग करे। उवित नहीं। जिन सब लूताका विप साप है उसके पमनाके विपसे फाटे हुए स्थानस शीतर और । काटने हो वृद्धिपत नामक शस्त्र द्वारा उस स्थाको पिच्छिल रधिरधाय होता है। कास, भ्यास आदि उपर | काट डाले तथा जाम्ययोष्ठशलाका अगिमें दप्त कर होत हैं। इसमें पूर्वोत रनर ताके विपकी तरह चिकित्सा उस स्थानको दग्ध करे । रोगा जव ता निधन परनी होती है। करे तव तक दग्ध करना न छोडे। ममस्थान न रणा लू ताके काटनेसे पिठासे गधविशिष्ट घोडा रत होनेसे यदि वह स्थान फूल जाय, तो उसे काट निकलता है। यर मूर्छा दाह, वमि, कास और श्यास | डालना तय है। कितु रोगीको यदि सर मा ये मय उपदर होत है। इसमें इलायचा, चक, रास्ता जाय तो काटना उचित नहीं। टे हुए स्थानमें मधु और चन्दन इन सव द्रष्योग महासुगन्धित नामक अगदके और सैधयके साथ निम्नलिपित अगदका लेपन करे। साग सेवन करे। असाध्य र ता विपो रोगको आशारा अगद यथा-प्रिय गु हरिद्रा कुष्ठ मषिष्ठा और यष्टिमधु परित्यागकर चिकित्सा करे। इन सब नयोको एकत्र कर घटे स्थान पर प्रलेप देशा अग्निवणाय बाटनेसे अतिपय दाह और रसरतादिवा | होगा। अथवा श्यामालता, मुठी, दाक्षा, क्षीरक्कोली माय होता है तथा उपर, फण्डू रोमाश दाह और शरीर | इदमून भूमिकुष्माण्ड और गोशु इनमः द्रोश मधु में म्फोटयको उत्पत्ति, ये सब उपदय होते हैं। पूगेच | के साथ पार करना होगा। अप्रभृति भारविटि गृणाके काटनेसे जैसा प्रतीफार बताया गया है वैसा ही । वृपको छालके गीतर कामे मेग्न करना मा पत्तंय