पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३५८

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लेप्छा-सेप्यस्तो यह लेपन कफघ्न मेदोनागक, शुक्रजनक, परमार, प्रयोग न करे तथा धणसे जब तक उत्ताप निकटता रहे, रक पद्धंक तथा चगी प्रसन्नता और कोमताकोरफ है। तब तक उसमें प्रोतल मारेपन न रे। क्योंकि व्रणकी मुम्बलेप द्वारा चप स्थिर, गण्डस्थर रधुरतर तथा! उप्याता नहीं निस्सनेमे पीछे वह वण विक्टरूप धारण घदन स्थूल, कमनीय व्यग और पौडवरहिन तथा कमल करता है। सहा दोता है। शरार लेपन के बाद भूषण पहनना प्रदेह लेपन दिनको हो हिर है । विशेषत पित्तज, उग्नि है। (भारप्र० पूर्वम०) रकन और अभिघातजन्य अपघा विपाय रोगमें दिा सुचतम लिया है कि लेप तो प्रकारका है, प्ररेप शो हो लेपारा पर्चव्य है। प्रदेश और थालेप। इनमेंसे शुफ हो या न हो शीतल ___पहले दिनका तैयार किया हुआ प्रलेप पदापि प्यर या मला होनेसे हो उसे प्रलेप पहने हैं। उण अथरा हार न करना चाहिये । पयोगि यह प्रलेप गाढा हो जाता शीतल, मोकया था तथा शु से प्रदेह तथा गोना। है निससे उष्णता, घेदना और वाद उत्पन होता है। प्रशारके मध्यवती होनसे उसे थालेप पाहते है। मरेपफे ऊपर प्रलेप न दे। जो मरेप एक बार शरीरम रतपित्तजन्य रोगमें आलेप, पातश्प्प जन्य रोगा। उतार दिया नाता है, उसका फिर दूसरा यार प्रयोग न अपरा टूटी हड्डो नोडोमें अथरा घ्रणा शोधन या परे। यह सूम्ब जानेके कारण काम हो जाता है। पूरण परनेम प्रदेव उरित है। शत वा अक्षत इन दोनों (अ तसूत्रम्या० १९२०) स्थान प्रदेशमाया जाता है। निमा २ सुधा, गांपोका चूर। ३ भोजन, या ४ तुमार नम्यानमें प्रयोग किया जाता है उसे निराद्धा लेपन | तामर गग्यदध्य । ५सिह शिगरम । करते है। इससे पणना जाता प्रण पोमल पना ( हि फि० ) गाढी गीली वस्तुको तह चढाना, होता तथा उमसे प्रतिगायतमासा जो पारडया र इमी गाढो चीर फ्ला पर पातना। पोथक्षार द्वारा दग्ध नहीं किया जाता उसके लिये पाला (दि. खा०) दत्ता पुत्र, गोद रिया हुआ पुर। थालेपहितकर है। जो द्रव्य पाने या पान परनेस पिन् (स० पु०) लिम्पनाति रिपFिT१ पक, रेल परारके मीनरके जिम दोष शाति होती है, उस दृया परने या पोतनेवाला । २पक लिपिकार । या प्रलेप देनेम गरीरम त्वास्थित उस दोपको att - प्प (म० त्रि०) लिप ण्यत् । लेपनोय, ले पा करा दोती है तथा प्रणको माला और सुजलाहर गोदा योग्य। दोती है। शरीरमा सम नोधन और प्रणको दाह | ___ शेती दारुमयी लोहा लेप्या लेम्ब्या च सकती। पाति परोम थालेपन दा प्रधान उपाय है। इससे मामयी मणिमयो प्रतिमाएपिया स्मृता ।' मास और रस सशोधित होता है तथा शोगका सुज (मागतः १९१२॥१२) हटको शान्ति होता है। शरीर मगस्थान का गुध J7 पन ( स० पु.) ले प्य कगेतीति एविए तुर स्ान जो सब रोग उत्पन्न होते है अफे साधन | रेषा, पोतनेवाला लिये आरन ति। रे प्यनारी (सामा०) १ अगरदन चर्चित रमणी ___ मारेपन तयार रोम पित्तनप रोगो ममी आरे । यद यो निस पर चदन मादिका रुपलगो हो।२ पत्थर पन द्रप्प मिला कर जिता होगा उसके सोलह माग | या मिट्टी की नीकी मूत्ति। पाछ भाग स्ने दृश्य (छन तैलादि) मिलाना होगा। लेप्यमयी (स० वा) रेयमय डीप । काष्ठादिभरिन पायुमाय रोगमें चार भाग तथा शेषन रोगम माघा पुतलिया, कठपुनलो। मिला पर प्रयोग परे । महिपश घमा आई होनस | रेपयोपिन् (सपा ) लेप्यनारा देखो। सह जितना कचा होता है यर्थान् फूल पाता है रारा प्यत्री (स. सी.) रेया ना। सुगन्धव्यनिता आलेपन भी उनना दो मोटा होगामारेपा ततिकालों! स्त्री यह सो निम पर चन्दन मादिका लेप लगा दो।