पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४०९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४१४ काण्व सौर अन्ध्रवश आदि कोकी स्वाति भारतप्रसिद्ध । भारत और मलय-प्रायोदीपमै जना जगा प्रायः १४ है। शहाबका लोप होनेसे भारतवर्ष में गुमशका | प्रकारके वास देगे जाने हैं। यह गरम देशोंमे अधिक अभ्युदय हुआ। स्कन्दगुप्तको परास्त कर तोरमाणने होता है और बहुत से कामाने आता है। इससे चटाश्या, भारतमे दृणवंगकी प्रतिष्ठा की । मालवराज यशोवर्मदेवने ! टोपिया, परचे, कुरनियां, टट्टर, अप्पर, हड़िया आदि Bण वंशीय मिहिरकुलका विध्वंस कर उजयिनीराज- अनेक चीजे बनती हैं। पदी नाही तो लोग चल वंशका गौरव बढ़ाया था। इसके बाद मगध, बलभी, वाससे दो मारामार दना लेने है और यही पदी उजयिनी, म्याण्वीश्वर, क्नोज आदि देशोंमें एक IF; पञ्चे वासके चौगोंमे भर कर चावल का पता लेने प्रवल पराक्रान्त राजवंभरी प्रतिष्ठा हुई थी। राद्रकृट ! है। इसके पतले बेजोसे रिसया नी बनती है। इससे वा गटोरवंश, भोज और चन्देल तया बनोजके आयुध । कोपलोंका मुग्या और साबार भी तैयार किया राजवंशका प्रभाव किमीसे भी छिपा नही है। इसके ' जाता है। सिवा भारतके नाना स्थानों में बुन्देला, जाट तपा निजाम- भिन्न भिन्न देशोमि यद भिन्न भिन्न नाम से प्रमिद्ध शाही, कुत्तवशाही आदि विभिन्न हिन्दू और मुसलमान , है। हिन्दी-यांस, पटात, मगरात, नलाभ . जातिसे बहुतों राजवंशको प्रतिष्ठा हुई है। बङ्गाला--येड़ वा देउवांस, वान, सासाम--- ब्लाद, उत्तर भारतीय इन सब महापराक्रमी आयुध राज बोलकतना ; संधाटी-पाट ; गारो-पाद पाण्डे . वंशके समय बङ्गालमें शूरवंशका प्रभाव फैला। भादि : ऋग्नाम-वरियाला , पक्षाघ--मगर, नाल , गुजरात . रके ब्राह्मण लानेका हाल बङ्गवासीमावको ही मालूम । वंश पोदण-कलम, पाठ, पाचदल- वग; है। पीछे यहां पाल और लेन-गजवंशका अभ्युदय बम्बई-मन्दले. माण्डगय , दाक्षिणात्य-मान, छोटा हुआ था। सेनवंशीय लक्ष्मणसेनको परास्त कर महम्मद | मंस होनेले भासा चौर वा होनेसे सम्न् ; गोंड-रुटि इ-वरितयार खिलजीन बङ्गालका फतह किया। वदुर , अरब-साब; पारस्य-मई. नामिन-मनगल, भारतवर्ष में मुसलमानो के आनेसे यहां गजनो, घोरी, ! मलपिल; तेलगू-मूलकाम, कङ्क, बोड़ा, बेदुरु, योग बेदुर गुलामवंश, खिलजोवंश, तुगलकश, सैयद, लोदी, नुर ! पोन्ते-घेदेरु, वेन्नेमुकर, चेन्नुर्शनि, वेत्तू ; कनाड़ी-विदु और मुगलबशने राज्य क्रिया । उसके बाद अगरेजराज जल, मघ-या नाह; ब्रह्म-व ग्नाकैत, कैकत्वा , निगा का अभ्युदय हुमा है। पुर--का उना, उना; चीन-छुद, गहरेजी-Bamboo | २ गृहका ऊर्ध्वकाप्ट, बैंडेर । ३ पृष्ठावयव, पीठकी वैनानिक भाषामें यह उद्वितचके तृणविभाग ( Gra रोढ । ४ वर्ग! ५ वाधभाण्डविशेष, वासुरो। ६ इन , mineal ) की दण्डतृण ( Bauulbuscal ) श्रेणीफे सन्त. एक प्रकारको ईख । ७ सर्ज नामक सालवृक्ष । ८ खड़ग- गत है । संस्कृत पर्याय-कीचक, त्वसार, कार, मध्योच्चभाग, खड्गके वीचका वह भाग जो ऊ चा त्वचिसार, तृणध्वज, शतपर्धा, यवफल, वेणु, मस्कर, होता है अर्थात् जहां पर वह अधिक चौडा होना है। तेजन, फिकुपर्धा, रम्भ. तृणक्तुक, कण्ठालु, एटकी. जनसख्या। १० अतिथि, मेहमान । ११ दश हाथका महावल, दृढग्रन्थि, दृढ़पत, धनुद्र म, धानुपर, दृढ़काण्ड, पक मान। १२ ग्रन्थिविस्तृत हस्तपदादिको अस्थि, क्लिाटो, पुष्पघातक । वाटु आदिकी लम्बी हडिौं । १३ नाकके ऊपरकी हड्डी, वांस साधारणतः ४०५० हाथ अर्थात् १००से १५० पांसा ! १४ विष्णु। १५ वजलोचन । १६ पुष्प, फूल। फुट तक लंगा होता है। छोटा वांस ३० फुटसे कम २७ तृणज्ञातिविशेष, वास। इस पृथ्वी पर विभिन्न ऊँचा नहीं होता। भारत तथा पूर्ण मारतोय देशों में स्थानको आवहवाके तारतम्यानुसार विभिन्न प्रकारका जितने प्रकारके वांस देखे जाते हैं. पाश्चात्य उद्भिविदोंने वांम उत्पन्न होता है। उदितत्त्वविद् वेन्थम और उनके आयविक गठन, दीर्घता, प्रन्थि और पनपार्थाक्ष्य. हुकारने २२ प्रकारके वांसका उल्लेख किया है। उनमेंसे ! का निर्देश किया है। नीचे उनके वैज्ञानिक नाम, उत्पत्ति-