पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४८०

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पडलाभापा १२॥ शतादौमे पाहतचन्द्रिकामे कृणपण्डितने । पगाचा प्रारत-रक्षण क्या है? लिखा है कि मराराष्ट्राय, अवन्ता, गौरसेनी अर्द्ध 'पशाचिच्या रणयाजनौ।' मागधा, पाहोका मागधा प्रकारा थामीर चाण्डाल (चपडका प्राकृत नक्षण ३१३८) शायर, नाचएड लाट, चैदम उपनागर नागर चार्जर पैशाचिका मापाम र और णी जगह 7 और न आरत्य पाचार, टाफ मालप, कैाय गौद उड़ दे होता पाश्चात्य, पाण्ड्य कौन्तल, सहल, बालिन प्राच्य कणाट पैगामीको विशेषता दिखानेक ठिगे रचिन भी मान्य, द्राविड गोर्जर ये ३४ मिन्न दा प्रचलित वाहन । स्व रिया है – 'या न" (१०१५) अथात् मूद्ध न्य 'ण' के भाषा है हारे सिवा वैवालादि २७ अपन श प्रास्त भो ! म्यानमें दत्य 'न' होता है। प्रचलित था। ग्रा पण्डितके मनसे उक्त प्रास्त गोड भाषाका परत उच्चारण रेनस मईय का भापाओं के मध्य काञ्चोदेनाय पाएडा पाञ्चाल गौड,। प्रयोग प्राय नहा ५ वरावर है । परदेशीय निम्न श्रेणोर मागध, प्रामएड दाक्षिणात्य शौरसेना, कैकय, शायर मनुष्य आज भो 'र' को नगह 3 का उच्चारण करने हैं। और द्राविन्ये ११ पैशाचोसे निकली है।। । वैसे 'करिताम को बल्लाम । कगारका लिग्रित ___प्राइन चाकाक प्रमापस हम अच्छा तरह समझते मापामें बहुत दिनमे म्धान राम करन पर भी 'ण ने है कि नव १२सा सदोर्म उन सब प्राकृत भाषान व्याक उतना दिन प्राधिकार न पाया। २००६ मन्को हात रणक मध्य स्थान पाया है तब उसक बहुत पहले हा लिपित चण्डोनाको एक पदापरीमें बहुन दिन हुप यह सब मापा लिखित मापा मा ममझा गइ था इसम इस प्रकारका दृष्टात सिग्नलाया गया है।* स देह नही । उत्त प्रमाणमे हम यह मानानन है कि पा मग विशेष 7 1 इस प्रकार है- राणा १सा मदोक परे ही हम लोगों गौड मगधमापा म। (चए प्रास्त ३११८) रेकयुन 7 और 4 की लिखित प्रास्तक मध्य तगा पैगाची भापास उत्पन जगह सरन दत्य म प्रयुक्त होता है। जैसे जी- पण्डित समाजम गण्य टुर थी। मीम आरिप-आमिस। ममा मन होता है कि गौडभापाको 'पिताजा' सच पूछिए तो गोड बड़गामी प्रात उच्चारपामें कहनेका कारण क्या? मुद्र य प और नाम्च्य सजगर आज मा तमाम ___ ऋग्वेदके ऐतरेय भारण्य य यह और गध' । द त्यसकारका उच्चारण सुना नाता है। का उल्लेख ह। मार दतार न अपना मापाटीकामें पक मरा विशेषता यह है- यम्य ज' (चण्ड पिता राक्षम ऐमा ल्यारया की है। उनको व्यवहन ३.१५ ) अधात् य' को जगद मन न होता है। जैस प्रारत भाषा ही बन पाछे शायद वैदिक ब्राह्मणोंक। यात्रा'-जाना। विना प रवाल यथाथम दरगम य वर्णका प्ररन उच्चारण प्रच मायसम्ररसे यहाको स्थानीय भाषा परिपुरासी , लित नहीं है, नर्वत्र य ज' रूपमें ही उच्चारित होता है। पर पामापाशप्रमाय विरल दरमहा हया। इसी गृणपण्डितने माय नी सो वर्ष पहले गौरभावामी कारण १२यीं सदाम शेष कृष्णपण्डितन पूर्याचार्यों को पिना पयों कहा, मालूम होता है और अधिक सम दाहार देत टुप गौडमागधभापाको आप वा मूल पैशावोसे माका नरूरत हो। उत्पन खोकार क्यिा है। पैशाचा प्रारतका मूल यहाई? घरसचिन लिया ६-'पशाची प्रकृति औरसा (११२) पैशाची भाषाकी - काम्बादेशीयप पदये च पाञ्चाल गौरमागध। प्रकृति गौरमा भयान् शरसे या मथुरा अञ्चलम शो माचपडदाक्षिणात्यन्च शौरसनञ्च फैकय ।। प्राचान मारन गापा प्राथा, उसमें भा पैशाची रार द्राविडचेष एकादा पिशाचना॥" (प्राकृतद्रिका) | साहित्य परियन् पत्रिका ५म भाग १७६ १८४ पृ.॥