पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५३०

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गिरिकएटक, गो, अभ्रोत्य, मेघभति, गिरिज्यर, जाम्यवि, । देखा जाता है। पत्रपतनक याद यह पेड मर जाता है । दम्भ, भिन्द्र, मघुज। (त्रिरा०) पदिक पर्याय-विद्य त्, भने समय घनाघातसे मृत चा मृतप्राय व्यक्तिको मिट्टा मि, हेति, नम, पवि, सक, युक, यघ, बन्न यक, मुत्स, में गाडरपोसे पुनजीवन लाभ करते देखा गया है । ईटों कुलिश, तुन, तिग्म, मेनि, स्वधिति, सायर, परशु।। के बने घर पर रज्रपात होनसे वह चूर चूर हो जाता है। (वदनि० २।२०)। अगरेजीमें वज्रको Thunder bolt कहते हैं। यह यनकी उत्पत्तिके विषयों पुराणादिमें विभिन्न मत | दो मेघोंके परस्पर सघपणसे विद्युत्के साथ उत्पन देना जाता है। मत्स्यपुराणम लिया है कि जन विश्व | होता है। कहते हैं कि गोवरकी ढेर या पदरी वृक्ष पर फर्माने सूर्णको भ्रमियन (खराद ) पर चढा कर घरादा यज गिरनेसे वह ऊपर नही उठ सकता और न भीतर पा, तय छिल कर जो तेज निकला था, उसास विणुका ही घुस सकता है। पातोश कहना है, कि वन देखने में श्रम, रुद्रका शूल और इद्रका वज, वना था। रोह शलाकाकी तरह होता है, कि तु यपाथर्म सो नहीं (मत्स्यपु. ११०) है। विद्युत् देखा। वामनपुराणमें लिखा है, किरद्र जव दिनिक गमार्म | २ विद्य त् विजली। ३ रत्नविशेष दोरा । पर्याय- घुस गये थे, तर यहा उ हे बालक पाम ही एक मास इद्रायुध, होर मिदुर कुलिश पवि, अभेद्य अशिर पिएद मिला था। रहने जब द्ध हो उसे हाथमे ले कर रत्न, दृढ, मागया, पटकोण, बहुधार, शतकोटि । गुण- दवाया, तब यह लम्या हो गया और उसमें सौ गाडे पह रसापेत सर्वगेगापहारक, सक्लपापनाशक, सौख्य दिघाइ पड़ीं। यहा पोछे कठिन हो र यन्त्र बन गया। कर दहदाढ र्यकारक और रसायन । (रासनि०) 'वशेष चित्र (वामनपु०६८ १०) | रण हारक २०दमें देखा । ४ वारक 1५ धात्री । ६ काजिक, मातम लिखा है, किरहने वृत्रासुरका यध करन । काँजा। ७ यजपुष्प। ८ लौइविशेष पक प्रकारका फे लिये दधीचि मुनिको अधि द्वारा विश्यकमासे वन लोहा । यह वनलीह अनेक प्रकारका होता है। जैसे- बनान कहा । विश्वकमाने घेसा ही किया। इटने इसी | नीलपिण्ड अरुणाम, मोरफ, नागकेशर, तित्तिराङ्ग, पनसे वृत्रासुरका बघ किया था। (भागरत ६१० ११ १०) स्वयंवन, शैवाल्वज गोणपन रोहिणो फाडोल प्रथि आहिस्तस्य में लिया है, कि तब बना भयानक चषक मदनास्य । । सभ्रविशेष, अवरक । भावप्रकाशमें शम्द सुद, उस समय पूर्व वा उत्तरमुख खडे हो इसकी उत्पत्तिका विषय इस प्रकार लिखा है- जैमिनिमुनिका नाम तोन वार ओस यनका भय जाता पुराकारमें छद्रने जव वृत्रासुरका सहार करने के लिये रहता है। (भानिक्तत्वत ब्रह्मापु०) ऋग्वेदर्म अप है, यज उठाया, तब उस पजसे भागा चिटगारियां निकल यि दधीचि ऋषिको हहोसादने राक्षसोंका ध्वस पिया पर भयानक शम्द करतो हुइ पहाड पर गिरी। जिस ऐतरेय ब्राह्मणमे इसका वर्णन इस प्रकार भाषा है। पिस पर्वतके शिखर पर यह चिागारिया गिरी थी, वहीं धोधि जब तर जोते थे, तब त अमुर उहे देख कर अवरकको उत्पत्ति हुई। चजसे इसको उत्पत्ति होनेके भाग जाते थे। पर जब पे मर गये, तब असुरोंने उत्पात कारण इसका यन नाम हुआ है। यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, मवाना आरम्म दिया। धोति ऋषिका मोजमें | वैश्य और शूदमे भेदसे चार जातिका है। ग्राह्मण जाति पुकर गये। यहां पता चला कि धोचिया देहावसान का अवरक सफेद क्षत्रिय जातिका लाल, पैश्यका पोला हो गया। इस पर इद उनकी दो दृढीगे। पुषरक्षेत्र में और शद नातिश अयरक पाठा होता है। सफेद अब उनए सिरको हड़ी मिली। उसाका पज धना पर रने व रौप्यप सस्कार विषयम लाल रसायनमें, पीला अमरों का सहार किया। स्वण सस्कारविषयमें भीर घाला अवरक सब रोगोंमें भतिरित महापातक होनेसे यत्राघातसे मृत्यु | काम आता है। होती है। नारियल आदि पथके शिपर पर पनपात होत पिनार, दद, नाग और पर यही चार प्रकारका __Tol I{ 130