पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५५३

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वनजार मिभुनियाके मन्दिरमें लौट आते हैं एवं पुनः प्रदोपालोक- कारण वनजार श्रेणीमुक्त होने पर भी वर्तमान जातीय में शुभलक्षण अवगत होने पर लूट-पाटके निमित्त घरके | पेशानुसार मुजफ्फरनगरवासी वनजारोंके मध्य धान- पाहर होने हैं। रास्तामें छींक होनेसे भी ये लोग | कुटा, लवण, नन्दवशी, जाट, भुग्विया ग्वाल, कोटवार, कार्य में विघ्न होनेको भावना करते हैं। गौड, कोडा तथा मुजहर प्रभृति श्रेणी-विभाग हो गये हैं। किसीको पीडा होने पर ये लोग वालाजीके नामसे पश्चिम प्रदेशके वनजार लोग साधारणतः पांच उत्सर्गीकृत 'घटादिया' नामक वृपकी पूजा देते हैं। इस विभागों में विभक्त हैं, उनके मध्य तुर्किया अथवा मुसल. घृप पर कोई कभी भी किमी तरहका बोझा नहीं लादता | मान श्रेणीमें ३६ गोत्र प्रचलित है, जैसे-तोमर, चौहान, वर लाल कपडे और फौड़ियोंके बने गहनोंसे इसे सुस गहलोत, दिलबारी, आलची,कनोठो, वुडकी, दुकी, शेख, जिन रखते हैं। ये लोग गुरु नानकको धर्मजगत्का नाथमार, अघवान, वदन, चकिराह, बहरारी, पटड़, एकमात्र कर्ताधर्ता समझ कर उनका ध्यान धरते है एवं कणिके, घाडे, चन्दौल, तेली, चरका, धगिया, धान. एकमात्र ईश्वरका सळधारत्व स्वीकार करते हैं। किका, गंगो, तितर, हिन्दिया, राह, मरौथिया, खाखर, किका. गो. तितरहिन्दिया. राम युक्तप्रदेशवासी वनजार जातिमें चौहान, बहुरूप, गौड, कडे या, वहलोम, भट्टि, वन्द्वारी, वरगंगा, आलिया तथा यादव, पणवार, राठोर तथा तुथार नामक श्रेणी-विभाग) खिलजी । ये लोग रूम्तम खाके अधीन मुलतानसे प्रथम है। वह रूप तथा गौडके अतिरिक्त इनको सभी वंशोपा- तो मुरादाबाद आये , इसके वाद विलासपुर तथा उसके धिया राजपूत जातित्वकी परिचारक हैं। ऐसी किम्व- समीपवत्तीं प्रदेशोंमें जा बसे। दन्ती चली आ रही है कि, इन लोगोंने एक समय अयोध्या तथा हिमालय के सविहित कई स्थानों में राज्याधिकार प्राप्त | वैद-वनजार लोग भाटनेरसे आये हैं । इनके सरदारका पार लिया था। बरेली राज्यस्ने इन्हें जंघार राजपूतोंने | नाम दुल्हा है। इनमें भलोई, तण्डार, हतार, कपाही, भगा दिया। १६३२ ई०मे पठान-सरदार रसूल खाने वरा- दण्डेरि, कटनी, तारिण, धरपाहि, कीरि तथा वहलीम इच जिलान्तर्गत नानापाडा परगनासे एवं १८२१ ई०में | ११ गोल प्रचलित हैं। लवाणं (लवणवाही ) चनजार चकलादार हकीम मोहेन्दीने सिजीली परगनासे लोग अपनेको गौड ब्राह्मणके व शधर कह कर परिचित इन लोगोंको निकाल दिया। खेरी जिलाके | करते हैं। ये लोग सम्राट औरंगजेवके समयमें रणस्तम्भ- जाने राजपूतोंने अपने मित्र बनजार लोगोंसे खैरा गढ़से आ कर दक्षिण-प्रदेश प्रवासी हुए। इनके बीच गढ़ प्राप्त किया था। सहारनपुर जिलान्तर्गत | भी ११ गोत्र प्रचलित हैं। ये लोग कृषि-कार्यसे अपनी देवदाँध नगर इन लोगों के द्वारा ही प्रतिष्ठित था, ऐसी जीविका चलाते हैं। किम्बदन्ती है। मुकेरी वनजार लोग कहते हैं, कि मकामें उनके एक __ होई जिलान्तर्गत गोपामी नगरके पनजार टोला- नायकका शिविर था। वहासे यह वश झाझरनगरमें आ वासी अपनेको मुसलमान साधु सैयद सालारके वंशधर कर वास करने पर जनसाधारणमें मक्काई या मुकेरी दताते हैं, फिर मन्द्राजवासी वनजार लोग अपनेको नामले परिचित हुआ। इस वातको समर्थन करनेके रामके अनुचर बन्दगधिपति सुप्रीवके वशधर कहते हैं।। लिये इन लोगोंने एक अत्यन्त उपास्यानकी कल्पना इन सब बातों पर आलोचना करनेसे साफ ज्ञात होता कर ली है। वह जो कुछ भी हो, किन्तु उन लोगोंके कुल- है, कि चनजार लोग किसी एक विशिष्ट जातिके सन्तान | गत नाममें हिन्दू तथा मुसलमानका संमिश्रण देख कर नही है। समय समय पर विभिन्न जाति अथवा शके | मालूम पड़ता है, कि यह जाति उक्त दोनों ही जातियों के लोग स्थानान्तरके प्रवासी हो कर इन लोगोंको वृत्ति समिश्रणसे बनी है। उन लोगों में निम्नोक्त शास्या अवलम्बन कर लेनेके कारण वनजार नामसे अभिहित प्रचलित देखी जाती है। जैसे-अघवान, मुगल, मोखर, हो गये है। इस तरह दस्युवृत्ति किंवा शस्य-वाणिज्यके | चौहान, सिमली, छोटा चौहान, पंचतकिया चौहान,