पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५७१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


यमि ५८२ पित्तज लक्षण-पित्तज चमनरोगमें मृा, प्यास, वमन रोगान्त रोगी तृप्या, श्याम तथा विचको द्वारा मुखशोप, मन्तक, तालु तथा दोनों आँखों में जलन, आँतो- पीडिन हो कर हठात् मृत्युको प्राप्त होता है। जिस मे अन्धेरा छा जाना एवं गीत हरा वा धूमवर्णयुक्त, | घमन रोगने रोगी क्षीण हो जाता है एवं सर्वदा रक्त- कुछ तीता, अति उष्ण पदार्थका वमन तथा चमनके | पूादि मिश्रित पदार्थ चमन करता है अथवा वमिमें यदि समय कण्ठमें ज्याला, ये सब लक्षण उपस्थित होने हैं। मग्पुच्छी तरह याभा दिखाई पड़े, किया यमनरोग- ___कफज लक्षण-कफन बमनरोगमें मुख मधुर रम के साथ यदि सास, श्वास, ज्वर, हिचकी, तृष्णा, भम, विशिष्ट, कफस्राव, भोजनमें अरुचि, निद्रा, शरीर भारी, हदोग प्रभृति उपद्रय उपस्थित होवे, नब यद धमनरोग स्निग्ध, धन, मधुर रसयुक्त तथा श्वेतवर्ण पदार्थ असाव्य हो जाता है। एन मघ लक्षणों के अलावे दूसरे चमन एवं उलटी होनेके समय शरीरमें रोमाञ्च तथा सब प्रकारके वमनरोगी चिकित्सा करनेसे इसका अति यन्त्रणा होने लगती हैं। प्रतीकार हो सकता है। सन्निपातज लक्षण-वमनरोगमें शूल, अजीर्ण, दाह, चिरित्सा-सब प्रकार यमनरोग थामाशयमें दोष प्यास, श्वास, मूर्छा एवं लवण सयुक्त उष्ण, नील चा संचित होनेने उत्पन्न होते हैं, इसलिये बमनगेगमें मवसे लोहित वर्णके घने पदार्थका वान होना प्रभृति लक्षण प पहले लंघन देना हो कर्त्तव्य है। उसके दाद कफ तथा प्रगट होते है। पित्तको दूर करनेवाली ओपधिका सेवन करना चाहिये । भागन्तुज वमन-कुत्सित द्रव्य भोजन तथा किसी तरह, किन्तु एक विशेषता यह है कि, वातज वमनरागर्म लघन घृणाजनक वस्तुको देखनेसे जिस घमनरोगको उत्पति देना उचित नहीं। वातज बमिरोगमें दूधमें बरावर भाग होती है, अथवा स्त्रियोंको गर्भावस्थाके समय जो उलटी जल मिला कर, सेंधा नमक तथा घृन मिधित मूग तथा होती है, कृमिरोग वा आमरससे जो वम होती आंवलेका शोरया पिलाना चाहिये। गुलंच, विफला, पहेडा, उसे आगन्तुज चमि कहते हैं। इस वमनरोगमे चातादि । आंवला, निम्ब तथा पोलना इन सबोंका काढ़ा बना कर तीन दोपोंमेंसे जिस दोपके लक्षण अधिक दिखाई पडे, मधुके साथ पान करनेसे पित्तज बमिरोग आराम होना उनके अनुसार उसे दोपज वमनरोग समझना होगा। है। हरॆका चूर्ण मधुके साथ खानेसे भी घमिरोगर्मे केवल कृमियों द्वारा जिस वमनरोगको उत्पत्ति होती है यदा पहुंचता है। उसमें अत्यन्त वेदना होती है। जिस तरह आगन्तुज विडंग, त्रिफला तथा शुडोका चूर्ण. किंवा विडंग, वमनके पाच कारण वदलाये गये हैं, उसी तरह इमके भी कैवर्तमुस्तक तथा शुटोचूर्ण समभाग ले कर मधुकं पाच भेद है, जैसे-असात्मज, कृमिज, आमज, वीभत्म साथ सेवन करनेसे श्लेष्मज बमिरोग विनट होता है। तथा दोह दज । इस आगन्तुज्ञ वमनमें वातजादि दोपोंके आंवला, खै नथा चीनी ८ तोला एक साथ पीस कर लक्षणानुसार इसके वातजादि कारण भी स्थिर करने | उसके साथ ८ तोला मधु पर्व ३२ तोला जल मिला कर चाहिये। कपडे से छान र पीनसे विदोपज घमिरोग भाराम इस रोगका उपय-कास, तमक श्वास, ज्वर, प्यास, होता है। गुलच द्वारा हिम (गीतस्पाय) नैयार करके हिचकी, विसनचित्तता, हृद्रोग एवं आँखाके सामने मधुके साथ पीनेसे कृच्छ साध्य त्रिदोषज मि भी हटान् संधेरा छा जाना आदि। आराम होती है। वमन रोगकी साध्यसाध्यता-वमनरोगमें यदि हरें, त्रिकटु, धनिया तथा जीरा समभाग चूर्ण कर- कुपित वायु, मल, मूत्र, स्वेद तथा जलवाही स्रोत रुद्ध के मधुके साथ चाटनेसे त्रिदोषन वमि तथा अचि नष्ट हो कर ऊर्ध्वगत होवे एव उससे रोगीके कोष्ठसे पूर्व | होती है। वेलको छाल, गुलच तथा खेतपपड़ाका काढ़ा संचिन पित्त, कफ वा वायु दूपित स्वेदादि धातु उद्दोर्ण मधु मिला कर पान करनेसे सान्निपातिक वमिका निवा- होवे और यदि वमि मलमूत्रको तरह दुर्गन्ध हो तो उससे रण होता है। आमकी गुठलो और वेलका काढ़ा मधु-