पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६९१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वछक-बलपुर राव थे। किन्तु अब ये लोग और अपनेको शक नहीं अली द्वारा ध्वंस होनेके पहले यह नगर आत समृद्धि समझते वर सूर्यवंशीय अयोध्यापति रामचन्द्र के पुत्र शालो तथा धन-जन पूर्ण था । चिकवटरमपुरका जल लयके वगमें अपने बल्ल या यप्प नामक किसी पूर्वपुरुष- वायु उतना वुग नहीं है। यहा मोरसु यमलियबंशीय की उत्पत्तिकी कल्पना कर अपनेको सूर्यवंशीय बताते हैं। कितने ही कृषिजीवी जातियोंका निवाम है। वे लोग पहले ये लोग मुनिपाटनके अन्तर्गत प्राचीन धाङ्क नगर अपने दाहिने हाथकी दो बंगुलियोंका छेदन करना अपने में आ कर बस गये एव आस-पामके स्थानों को जीन । जीवनदा कर्त्तव्यकर्मा समझते हैं, इसलिये उक्त वक्कलु फर अपनी राजशक्ति फैलाई थी। उनका यह राज्य बल्ल शाखामुक्त ग्मणियां अपने धर्मका रक्षाके लिये अपनी क्षेत्र और राजधानी वलीपुर नामले प्रतिष्ठित हो गया। अपनो कन्याओं के विवाह समय फर्णवेधनके साथ साथ तथा यहाके गजब भने बल्लरायका उपाधि धारण कर दाहिने हाथकी दो सगुलियोंका छेदन कर देती है । इस अपना प्रभाव फैलाया था। समय वे यथानाध्य पूजा अनुष्ठान करती हैं एवं प्रामके सौराष्ट्रकी राजशक्तिकी प्रतिष्ठाके बाद वल्लगण अपने- मारको बुलाती है और उन्हे कुछ फटाईकी मजुरी फो मेवाडके गहलोतवगियो की समश्रेणी मानने लगे। दे कर पन्यासोंकी दो सगुलियोंका अपरस्य भाग करा किन्तु राज इतिहास पढ़नेने पता चलता है, कि गहलोत देती है। यह आईन विरुद्ध होने पर भी १८७४के प्रारम्भ- गण शिवको उपासना पहले सूर्यकी उपासना करते थे, में बटलरके अन्तर्गन देय सहोल्ली प्राममें एक रमणीके नवसे सौराष्ट्रके वल्ल लोग अपनेको इन्दुवंशोन्नव और पय्यानुरोधमे दो अंगुलिशं काटी गई थी। चीतल पलिक पुत्र मानते है। बलिकपुत्रगण सिन्धुतीरवती नामक यन्त्र द्वारा एक ही आघातमें अंगुली काटनेको अरोर नामक स्थानमे राजत्व करते थे। १३वी सदीमे रीति है। वल्लगण बडे दुर्द्ध हो उठे तथा उपर्युपरि मेवाड पर इस सद्भत कियाके सम्बन्धमें उन लोगों के बीच एक चढाई कर दी। गणा हमारने एक लड़ाई में चोतिला किम्बदन्ती चली पानी है-प्राचीन कालमें वृक नामक चल सरदारको मारा था। धाडके वल्ल-सरदारश पक राक्षस था। उसने कई सहम वर्षकी फठिन तपस्या- आज भी जातोय-गौरवको रक्षा कर रहे हैं। से महादेवको प्रसन्न किया था। उसकी तपम्यासे समीराजवश देखो। सन्तुष्ट हो कर महादेवने उस राक्षसको दर्शन दिया और यल्लक ( स० पु० ) समुद्रमे रहनेवाला एक प्रकारका यहा- यत्स ! हम तुम्हारी तपम्यासे प्रसन्न है, इस समय संतु। यथाभिलपित वर मांगो 1 राक्षस देनादिदेव महादेवकी चल्लकर (म० पु० । एक प्रकारका कर। ऐसी वाणी सुन कर बोला-देव ! यदि इस दास पर यल्लकी (संत्रा०) वल्लने इति बल-कुन्, गौरा- दया कर दर्शन दिया है, तो मुझे ऐसा वरदान दीजिये, दित्यात् टीप । १ वोणा।२ मल्लकोवृक्ष, सलईका पेड। जिससे मैं जिसके मस्तक पर हाथ रग्बू, वह तत्काल चल्रगुणपुग ( स० लो०) पूगविशेष, एक प्रकारकी भस्म हो जाय । आशुतोषने राक्षसका असदभिप्राय न सुपारा। समझ 'तथास्तु' कह कर वहांसे प्रस्थान क्यिा। दुवृत्त व्हरटम-एक प्राचीन कवि । सुवृत्ततिलका क्षेमेन्द्रने | चुक्ने देवप्रदत्त इस असाधारण शक्तिकी परीक्षाके लिये इनका उल्लेख किया है। महादेवका पीछा किया। शिव कोई उपाय न देख कर बल्लटभागवत-एक कवि। घड़ी शीघ्रतासे भाग चले। राक्षस भी उनके पीछे दौड़ा। वल्लन-पक प्राचीन कवि । महादेवने राक्षसको बहुत समीप देख कर पकड़े चल्लपुर-दाक्षिणात्यके अन्तर्गत दो प्राचीन नगर. चिक्क ! जानेके भयले एक वनमें प्रवेश पिया। राक्षस भी बड़ी तथा दोद्द, बल्ल पुरके नामसे विरयात है। उक दोनों तेजीसे दौड़ता हुआ वनके समीप पहुंचा। वहां उसने नगर परस्पर ७ कोसकी दूरी पर अवस्थित है। हैदर- एक खेतमें एक कृषकको देख कर पूछा-शीघ्र बोलो