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देशांतर ७७° १२' पू० में अवस्थित है। इसकी लोकसंख्या (आबादी) कोई १०,९८४ होगी। गढ़वाल का दुर्ग राजा सोमाद्रि ने १७१० ई० को बनवाकर तैयार कराया था। इस नगर में रेशमी साड़ियाँ, रूमाल और ज़रदोषी (ज़रदारी) किनारे की बढ़िया धोतियाँ बनती हैं और लाखों रुपये की हैदराबाद आदि निकटस्थ नामी बाज़ारों में जाकर बिकती हैं। खड़ा(हिं० पु०) गढ़ा देखो।
गढ़ाई (हिं० स्त्री०) १. गढ़ने का काम। २. गढ़ने की मजदूरी।
गढ़कोट (गढ़ाकोट) मध्य भारत के सागर जिले का एक विभाग। इसका प्रधान नगर भी गढ़कोट ही है। वह सोनार और गधेरी नदी के संगम पर अक्षांश २३° ४७' उ० और देशांतर ७८° ४१' ३०" पू० में सागर नगर से १५ कोस पूर्व को पड़ता है। संभवतः यह शहर गोंड लोगों का बनाया हुआ है। १५२८ ई० को बुंदेलखंड के चंद्रशाह नामक किसी राजपूत सामंत ने गोंडों को निकाल करके गढ़कोट पर अधिकार किया और एक दुर्ग बना दिया था। पन्ना के बुंदेला राजा छत्रसाल के पुत्र हृदयशाह ने चंद्रशाह वंशीय किसी राजा को रहली के अंतर्गत नायगुवान ग्राम अर्पण करके यह नगर ले लिया। उन्होंने नदी के दूसरे पार एक और दुर्ग तथा नगर निर्माण करके उसका नाम हृदयनगर रखा था। १७३९ ई० को हृदयशाह का स्वर्गवास हुआ। पाँच वर्ष बाद शोभासिंह और उनके भाई पृथ्वीसिंह दोनों के बीच झगड़ा उठा था। पृथ्वीसिंह पेशवा के साहाय्य (मदद) से अपने आप राजा बन बैठे। १८०९ ई० को नागपुर के राजा ने जब किले पर आक्रमण किया, तब पृथ्वीसिंह वंशीय लड़के नरसिंह ने सिंधिया का आश्रय लिया था। ज्यां बपतिस्त (Jean Baptiste) नामक किसी यूरोपीय सेनापति के अधीन सिंधिया ने एक फौज भेज दी। युद्ध में नागपुर की सेना के हारने पर सिंधिया ने मालथौन और गढ़कोट पर अधिकार करके शाहगढ़ तथा अन्य प्रदेश नरसिंह को दे डाले और बपतिस्त साहब ससैन्य गढ़कोट में रहने लगे। थोड़े दिनों बाद अर्जुनसिंह ने चालाकी से किला छीना था, परन्तु ६ महीने पीछे जनरल |
वाटसन ने अंग्रेज़ी फौज के साहाय्य से उन्हें निकाल बाहर किया। यह राज्य सिंधिया के अधिकार में तो रहा, किन्तु अंग्रेज़ सरकार इसमें अपना एका (हस्तक्षेप) चलाने लगी। १८६१ ई० में अंग्रेज़ों ने सिंधिया को दूसरी जगह देकर इसको अपने अधिकार में कर लिया था। आजकल नगर दो भागों में विभक्त है। बीच में सोनार नदी बहती है। नदी के उस पार हृदयनगर में कारबार (व्यापार) की बड़ी जगह है। यहाँ स्त्रियों के पहनने का सूती और पट्टी नामक वस्त्र बनता है और प्रति शुक्रवार को बाज़ार लगता है। इसके अतिरिक्त यहाँ पौष मास को एक बड़ा मेला भी होता है। सोनार और गधेरी नदी के संगम के पास ऊँची भूमि पर किला बना है। उसमें बहुत घर हैं। १८५८ ई० में अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यू रोज़ ने उसको जीता था। नगर से एक कोस उत्तर को 'मर्दन गढ़' नाम के प्रासाद (महल) का भग्नावशेष पड़ा है। उसकी दीवार आज भी नहीं बिगड़ी। यह प्रायः ६० हाथ ऊँचा होगा। एक घुमावदार जीने (सीढ़ी) से उस पर चढ़ा जाता है। गढिया (हिं० पु०) गढ़ने वाला, वह जो कोई चीज़ बनाता हो।
गढ़ोई (हिं० पु०) किलेदार, गढ़पति।
गण (सं० पु०) गण, कर्माणि अच् कर्तरि अच्, वा।
१. समूह, ढेर। “ "गणानां त्वा गणपतिं" (वाजसनेयी संहिता २३।१९) २. प्रमथ, शिव के सेवक। "मूर्त्सु विरती गणेषु सादरं वीक्ष्य नाथः" (मेघदूत ५६)। ३. सेना की संख्या। सत्ताइस रथ, सत्ताइस गज (हाथी), इक्यासी घोड़े और एक सौ पैंतीस पदाति (पैदल सैनिक), सब समेत दो सौ सत्तर की संख्या को 'गण' कहते हैं। ४. चौर नामक गंध द्रव्य। ५. गणेश। "गणदीक्षा प्रवर्तकः" (महानिर्वाण तंत्र)। ६. विवाह में लड़का और लड़की का सद्भाव वा असद्भाव (गुण मिलान) जानने का उपाय विशेष। ज्योतिषियों ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है, यथा- देवगण, मनुष्यगण (नरगण) और राक्षसगण। पूर्वफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्रपद, भरणी, आर्द्रा, और रोहिणी... |
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गढ़ा-गद्य