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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८९

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गन्धर्व

प्राणीकी मृत्यु होने पर जब तक दूसरा शरीर प्राप्त नहीं होता है, तब तक यह एक सूक्ष्म शरीर धारण कर यातना अनुभव करते हैं उनकी इस अवस्थाको अन्तराभवसत्त्व कहते हैं।

टीकाकार रमानाथके मत से अन्तराभवसत्त्व का अर्थ गुप्त प्राप्तने उदाहरण स्वरूप विराटपर्वका "गांधर्वा नव्यासन्न" यह वाक्य उद्धृत किया है।

४ ग्रहविशेष, एक प्रकारका ग्रह, जो समय पाकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर अनेक तरहकी अशन्ति उत्पादन करता है। वैद्यकचिकित्सक का कथन है कि वध और आतुर रोगियोंको निशाचरोंके हाथसे रक्षा करने के लिये सावधान रहना चाहिये। रोगी शौच या अशौच न हो किसी तरह अशुचि होते ही यह साक्षात् नाव पूर्ण करने अथवा पूजा पानेकी आशासे रोगीके शरीर में प्रवेश कर उसे अनेक तरह कष्ट देते हैं। यथा-नियम उनकी पूजा वा उपहार भोग नहीं देने से वे रोगी को मार डालते हैं।

इस प्रकार ग्रहों की संख्या बहुत है। किन्तु प्रधानतः ये आठ भागोंमें विभक्त किये जा सकते हैं। यथा देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, पितृ, राक्षस, भुजङ्ग और पिशाच। उनके आवेश होने पर रोगी भूत भविष्यत्का हाल मालूम कर सकता है। उस समय वह भूत और भविष्यत् घटना की जा...... है साफ़ साफ़ कह देता है उस समय रोगीकी महिला विलुप्त हो जाती है। जो सब कार्य मनुष्य बुद्धिसे अगम्य हैं, कभी भी उनसे वे कार्य सम्पन्न नहीं हो सकते उन्हें रोगी अनायास ही अनुष्ठान करके दर्शकों को विस्मयापन्न और आत्मीय स्वजनोंको भयविह्वल तथा शोककातर बना देता है। आधुनिक वैज्ञानिक जो कुछ कहें लेकिन प्राचीन विद्वान् इस अवस्थाको भूत वा ग्रहावेश कह एवं पूजादि करके रोगीको प्रकृतिस्थ कर देते थे।

गन्धर्व ग्रह के आवेश होने पर रोगीका मन सदा हृष्ट रहता और नदीतीर वा निर्जन वनमें भ्रमण करनेकी यथेष्ट अभिलाषा बनी रहती है। इस अवस्थामें रोगी गंध, माल्य और गीत बहुत पसन्द करता तथा कभी नाचता और कभी हँसता है।

दर्पण छाया वा प्रतिबिम्ब प्राणीके देहमें शीतोष्ण और सूर्य किरण एवं देश जीव जिस प्रकार अलक्षित होकर प्रवेश हो जाते हैं, उसी प्रकार गंधर्व ग्रह भी अलक्षित होकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। इसकी शान्तिके लिये नियमित जप और होम प्रभृति देवक्रियायें करनी चाहिये। वर्ण गंधमाल्य मधु घृत अनेक प्रकारके खाद्य वस्त्र, मद्य, मांस, रुधिर और दुग्ध प्रभृति प्रदान करना उचित है।

इतने करने पर भी यदि रोगी की शान्ति न मिले तो औषध प्रयोग करना चाहिये। काकल, भालुक, शल्यक और इनके चमड़े और रोमकी ढी एवं काशमुच्च मिलाकर धूम प्रयोग करनेसे बलवान् ग्रहसे रोगी छुटकारा पा सकता है।

गोमपार्क, नकुल, बिडाल पर भालुकका पित्त एकत्र कर गजपिप्पली मूल, त्रिकटु आमलका क्षार सरसों देकर भावित करें। इसके नस्य लेने और सेवन करनेसे ग्रहकी शान्ति है।

नटकरञ्ज विकट, हीङ्गु, वेलमूल, हरिद्रा और दारुहरिद्राको एक साथ लेकर इसकी बत्ती बनावें। पित्तके सहयोग से इसका अञ्जन सेवन करने से ग्रहकी शान्ति होती है।

ये सब औषध या अन्य कोई चिकित्सा देवग्रहमें अयुक्तरूपमें प्रयोग नहीं करनी चाहिये। पिशाचके अतिरिक्त किसी दूसरे ग्रहमें कोई प्रतिकूल आचरण करना निषिद्ध है करनेसे वह क्रुद्ध होकर वैद्य और रोगी दोनोंको ही नाश कर डालता है। (सुप्त उण ०६ अ०)

गन्धर्वग्रहकी कथा वैदिक उपन्यास में भी वर्णित है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि किसी समय बहुत मुनिकुमार अध्ययनके लिये मद्रदेशको गये थे। विश्रामके लिये वे कपिगोत्रसम्भव पतञ्चलके गृहमें जा पहुँचे। वहाँ पतञ्चलकी कन्या गन्धर्वग्रहके आवेशमें शोच्यभूत देखा।

"ऋधदण दतडह दतडढतथझल लधझ तेज णतजझ झढढजथक्षश्रलदतत (बृह दधरमक)

५ ऐरण्ड, अंडी।

"ग लवधधमयलधधर हरिरधदत ध़़नमभभ ।(यदि प्रकाश)

६ देवयोनिविशेष, स्वर्गके गायक। ये देवताकी