पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१६२

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महापुण-महामसाप नामक एक नागा जातिको भी उन्होंने अपने धर्ममें दौसा महापूत (सं०शि०) मति पवित। 'दी थी! ' महापूर्ण ( स० वि०) १ संपूर्ण, पूरा। (०) २ गारही । फवविहारके यातसे लोग इनके धर्ममतके अनु- एक अधिपतिका नाम प्रायो थे। उनके प्रधान शिष्यका नाम था गाधयदेव । मदापृष्ठ (.) गए विपुलं पृष्ठ पत्यार ... । महापुरुषय शून महन्त भी ब्राह्मणको मन्त दे सफता अंट। २ वृहत् पृष्ठ, चौड़ी पीठ। मायके एक मनुः । घाफका नाम जो अपमेय पश्फे सम्भाध है। शङ्करदेयके दो प्रधान सत्र वा अपाड़े हैं। एक

  • महापैट्ना (सं० लो०) आधापन गृह्यसूत्रोल वेदिका

नौगांव जिलेके यड़दोया प्राममें और दूसरा गौहाटी | जिलेके पदपेटा प्राममें। दोनों सलोंमें हरिकीर्तन आदि महापशाचित (स करनेके बड़े बड़े घर हैं । प्रतिदिन प्रातःकाल, मध्यकाल, प्रणालो-धो ४ सेर', पूर्ण के लिये जटामांसी, हरीतकी, . ) पुतोषविशेषानुन. अपराह और रात्रिकालमें सैकड़ों आदमी मिल कर | मृतफेशी, स्थलपन, मलपुशीका वीज, पत्र, अपिली, नामकीर्तन फरते हैं। यहां योचमें यीचमें साम्प्रदायिक / काकोली, कटको, छोटी इलायची, पाराहीकाल, सौक , तथा वैष्णयोंका पयिन श्रीमद्भागयत प्रथ भी पढ़ा सोयो, गुग्गुल, . अपराजिता, मामलकी, रास्ना, गग्ध. जाता है। रास्ना गौर शालपणी कुल मिला कर एक सर। इस सम्प्रदायमें जो संसारत्यागी हैं ये फैयलिया १ पाफार्य जल १६ सेर। पीछे तपाक विधानानुसार भक्त कहलाते हैं। वहपेटा सतमें कमसे कम डेढ़ सौ । इसका पाक करना होगा। इस धुतको पीनेसे पामार फेयलिया भक्त रहते हैं। ये लोग प्रतिदिन चार बार | और मपस्मरादिनामा रोग नष्ट होते हैं तथा युमि और फरफे हरिफोन करते हैं। इस सतमें नियां भी हैं। स्मृति मी प्रलर होती है। (भैपापरता उन्मादाधिका०) । कीर्तनादिके समय ये पुरषों के साथ नहीं मिलतों, मलंग "महापैठोगसि (स.पु.) एक प्राचीन स्मृतिकार। रद कर हो गाती जाती हैं। इस सतमें शङ्करदेय तथा "महापोटगल (२० पु०) शारगुणपिशेष, गरकर।। उनफे.प्रियतम शिष्य माधयफा समाधि मन्दिर विद्यमान | मदाप्रकाश (सं.पु.) भतार माविका आविर्भाव या है। एक एक सलमें एक एक पएट पत्थर पर शङ्करदेयका | चरणयिह अंकित देखा जाता है। शब्दरदेव नाम घोपा, " महामति (सस्त्री० ) महती श्रेष्ठा प्रतिगमूह नामक प्रचालिस गपे हैं। कोई कोई कहते हैं, कि उक्त कारण मगमती दुर्गा पेही परिका गुल कारण मानी अन्य अधूरा छोड़ कर हो घे परलोकयासी हुए थे। माती है। पीछे उनके शिष्य माधयदेयने उसे शेष किया था। "चितिभ्वतन्ममा तना मा निशा महापुष्प ( स० पु.) १ कुन्दरक्ष। २ ष्णमुर, काला मात् प्याच स्पिया सर्व महा या inn" : . मुंग। ३रत काशन, लाल कनेर । ४ लवणक्ष, अम. ":. . (मीपुराय ) लोनी नामको घास। ५ संयुतको भनुसार पफ प्रकारका महाप्रजापति (सं. )पिम्णु। - . ...." फोड़ा। (लि०) महापुष्पपिशिष्ट। महामापती-भाषमुनिकी याची, गौनगी । म महापुपा (सखी .) मदन प्रशस्त पुपमस्या। १ मायसिंहका लालनपालन शिया था अपराजिता । २ महाकोशातकी, धीमा-तरोई। महामहापारमिनापून (सं.ली.) मदापूजा (सं.खो.) दुर्गाको पद पक्षाशी याचिन । माम। . . . !: . मपरासमें होती है। "शरनाले माजा पाच पालको। . महामाद ( पु.) घर न महामनाप (101) मनिगा मागगुमा, लापो विशेषयहरभरपतत्परः (शाकानदाविप) प्रमायशासी।