पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१७९

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महाभारत २६३ प्राणाचार्य के मरनेके. पाद क्रोधान्धित अश्वत्थामाका , विश्य वर्णित हुए हैं। इसमें ५६ अध्याय और ३२२० भयङ्कर भाग्नेयास्त्र (नारायणास्त्र )-का प्रयोग करना. श्लोक हैं। ..सदमाहात्म्य-वर्णन, व्यासका बागमन और कृष्ण-अर्जुन- १० छौतिकपर्व । का माहात्म्य वर्णन, इस पर्व में ये विषय विशेषरूपसे पाएडयोंके रणस्थल त्याग करनेके बाद दुर्योधन

यर्णित हुए हैं। सिया इसके अनेकों राजाओंफे मरनेका दृटी हुई जांघको अवस्थामें जहां पड़ा था यहां

वृतान्त भी लिया गया है । इस पर्व में १७० अध्याय सन्ध्याको कृतवर्मा, कृप और अश्वत्थामाका .. और ८६० श्लोक हैं। उपस्थित होना, दुर्योधनको अवस्थाको देव अश्वत्थामा- ...... ..कर्णपर्व । का फ्रोधित होना और प्रतिशत करना, फि धृष्टद्युम्न आदि 7धीमनु मदराजका सारथिके काममें नियुक्त । पाञ्चालगण और अन्यान्य मन्त्रियों के साथ पापोंका होना, : पौराणिक लिपुरका मरण पृत्तान्त वर्णन, विनाश जब तक न करूंगा, तब तक शरोरसे कवचन युद्धपाखाके समय मदराज और कर्णका परस्पर चाक- । उतारूंगा। इसके बाद उन तीनों रथियोंका यहाँसे , युद्ध, कर्ण को तिरस्कार करनेके लिये शल्य द्वारा इस जाना और सूर्यास्तसे पहले एक महावनमें प्रवेश करना - और कौएका भाण्यान, अश्वत्थामा द्वारा पाण्यराजका और एक पटवृक्षके नीचे जा कर एक उल्लूको रातफे पिनाश, दएडसेन और दण्डका वध, सर्वधनुर्धारी समय फौओंका विनाश करते देखना, यह देख .. पाकियोंके सम्मुख रय युद्ध में कर्ण द्वारा धर्मराज अश्वत्थामाका पितृ-यध स्मरण करना और शोध कर

युधिष्ठिरका प्राणसंकर, युधिष्ठिर और अर्जुनका परस्पर ! मनमें यह कल्पना करना, कि सो जाने पर पाबालीका

कोप, कृष्ण द्वारा अर्जुनका अनुनय, पृकोदरका रंण- | विनाश करूंगा। इसके बाद पाण्डवों के प्रेमे अश्य. स्थलमें पूर्व प्रतिक्षाफे बानुसार दुःशासनफे यक्षःस्थल- स्थामाका जाना और खेमेके दरवाजे पर पर्वताकार गगन- .को फाष्ट फर उसका रक्तपान करना, रथ युगौ | स्पीभयडर राक्षसको देराना। राक्षसका भीतर घुसनेमें भिम द्वारा कर्णका वध। इस पर्य में इन्हीं सय याचा डालने पर द्रोणपुत्र अश्वत्थमाका घीरपक्ष राष्ट्रकी विपयोंका समावेश है। इसमें ६६ अध्याय और ४६६४ आराधना कर कृप, रतवर्माके साथ रोममें प्रवेश और श्लोक हैं। ... ... . सोते हुए धृष्टद्युम्न और सपरिवार पाञ्चालों तथा द्रौपदी शैल्यपर्व । तनयोंका संहार करना । कृष्णके चातुर्यसे सात्यकि और

कर्ण के वध होने पर शल्यका संगापति होना, पञ्चपाण्डवों की रक्षा, याकी सवोंका विनाश, अश्वत्थामा

माना. इथियोंके पृथक पृथक् रथयुद्धका वर्णन, का अपने हाथोंसे पाचालॉको मारना, धृष्टद्युम्नके कीरय . पमीय प्रधान प्रधान। योद्धाओंका वध, सारथोका इस भयङ्कर दुर्घटनाका वृत्तान्त पाएडयोसे - धर्मराज धारा मल्यका वध, प्रायः सारी सेनाओंके मारे कहना, गोकार्ता और पुत्र तथा नात्यधमातरा द्रौपदी- "जानेके बाद दुर्योधनका सालायमें प्रवेश और जलस्तम्भ का पतियों पर अनगन फर त्याग करनेका दृढ़ संकल्प कर वहाँ रदना, ग्याओंका दुर्योधनके छिपनेका हाल करना, भीम पराक्रमो भीमसेनका द्रौपदोके कहनेफे अनु. मोमसे कदना, धर्मरामको तिरस्कार पूर्ण बातोंको सुन सार उसके प्रियसाधनके लिये क्रोधित हो कर गदा ले सुर्योधनका तालाबसे निकलना, जहां मोमके साथ दुर्यो- कर अश्वत्थामा पीछे पीछे दीना, द्रोणपुत्रका मोमका धनका गदा-युद्ध हुआ यहां सब लोगोंका आना, इसके मयतुर होना और दैवमेरित प्रोषपूर्वक 'पृथ्वी पाएरव. पार बलरामका मागमन, सरसती-तीर्थ और अन्यान्य रहित हो ऐसा कह नारायणाखमा छोड़ना, इस पर कृष्ण. तीर्थो का माहात्म्य-यणम, उस रणभूमिमें सुयोधनफे का अश्वत्थामाको मना करना, अश्वत्थामाझा पिाहा. .माथ भीमका तुमुल गदा युख, युद्धस्थलमें भीमको गदा शरण देन मनका इसी गारसे निधारण करना, प. से दुर्योधनको धा सोमना, इस पर्व में ये दो सवा त्यामा और दैपायन ग्यासका परस्पर शापका