पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१८१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


महाभारत 173 दाणाचार्य के मरनेके बाद क्रोधान्धित अश्वत्थामाका, विषय वर्णित हुए हैं। इसमें ५६ अध्याय और ३२२० भयङ्कर भाग्नेयास्त्र (भारायणास्त्र ) का प्रयोग करना, श्लोक हैं। .. रुखमाहात्म्य-वर्णन, व्यासका मागमन और कृष्ण-अर्जुन १०ौतिकपर्व । । का माहात्म्य वर्णन, इस पर्व मे ये विषय विशेषरूपसे। पाण्डवोंके रणस्थल त्याग करनेके याद दुर्योधन यर्णित हुए हैं। सिया इसके अनेकों राजायोंके मरनेका टूटी हुई जांधको अवस्थामै जहां पड़ा था यहां . वृत्तान्त भी लिना गया है । इस पर्व में १७० अध्याय सन्ध्याको कृतयर्मा, एप और अश्यत्यामाका धौर 206 श्लोक है। उपस्थित होना, दुर्योधनको अवस्थाको देश अश्वत्थामा. ...... का का फ्रोधित होना और प्रतिज्ञा करना, कि धृष्टद्युम्न आदि धोम मदराजका सारथिके काममें नियुक्त । पाञ्चालगण और अन्यान्य मन्त्रियोंके साथ पाण्डवोंका होना, पौराणिक त्रिपुरका मरण वृत्तान्त वर्णन, । विनाश जय तक न करूंगा, तब तक शरोरसे कवच न युद्धपात्राके समय मद्रराज और कर्णका परस्पर पाक-1 उतारूगा। इसके बाद उन तीनों रथियोंका यहाँसे युद्ध, कर्ण को तिरस्कार करने के लिये शल्य द्वारा इस जाना और सूर्यास्तसे पहले एक महायनमें प्रवेश करना मोर कीएका गाण्यान, अश्वत्थामा द्वारा पाण्डयराजका और एक वटवृक्षके नीचे जा कर एक उल्टूको रातफे .विनाश, एडसेन और दण्डका पध, सर्व धनुर्धारी समय कौओंका विनाश करते देखना, यह देख पाक्तियों के सम्मुख दररथ युद्ध में कर्ण द्वारा धर्मराज अश्वत्थामाका पितृ-यध स्मरण करना और शोध कर

युधिधिरका प्राणसंकट, युधिष्ठिर और अर्जुनका परस्पर मनमें यह कल्पना करना, कि सो जाने पर पाबालोंका

..कोप, कृष्ण द्वारा गर्जुनका अनुनय, पृकोदरका रंण दिनारा फलंगा । इसके बाद पाण्डवोंके मेमे अश्य. • स्थल में पूर्व प्रतिमा के अनुसार दुशासगफे पक्षामधल-स्थामाका जाना और खेमेफे दरवाजे पर पर्वताकार गगन- ..को 'फार फर उसका रक्तपान करना, वैरथ युरमे । स्पीभयङ्कर राक्षसको देखना । राक्षसका भीतर घुसनेमें मसुम द्वारा कर्ण का वध। इस प में इन्हीं सब याधा डालने पर द्रोणपुत्र अश्वत्यमाका घोरपक्ष सद्रकी

विपोंका समावेश है। इसमें ६६ अध्याय और ४९६४ ।

भाराधना कर एप, कृतवर्माके साथ खेमेमें प्रवेश और

श्लोक हैं। ... . .

सोते हुए धृष्टद्युम्न और सपरियार पाञ्चाली तथा प्रौपदी शल्यपर्व। तनयों का संहार करना । एप्पणके चातुर्यसे सात्यकि और

कर्ण के पथ होने पर शल्यका सेनापति होना, पञ्चपाण्डवोंको रक्षा, याको सवोंका विनाश, अश्वत्थामा

"जाना इपियोंके पृथक पृथक् रपयुद्धका वर्णन, का अपने हाथोंसे पाद्यालोको मारना, धृष्टद्युम्नके कीय : पीय प्रधान प्रधान योद्धाओंका वध, सारयोंका इस भयङ्कर दुर्घटनाका वृतान्त पाएमसि -पराजद्वारा शल्यंका वध, प्रायः सारी सेनाथोंके मारे कहना, गोकर्ता और पुत्र तथा मातृयधकातरा द्रौपदी. "जाने के बाद दुर्योधनका सालायमैं प्रवेश मौर बलस्तम्भ का पतियों पर अनशन फर त्याग करनेका दृढ़ संकल्प "कर यहां रहना, म्यापोंका दुर्योधनके छिपनेका हाल करना, भीम पराममा भीमसेनका द्रोपदी काहनेके अनु.

मोमसे कहना, धर्म रामको तिरस्कार पूर्ण दातोंको सुन सार उसके प्रियसाधनके लिये क्रोधित हो कर गदा ले

धिनका सालापसे निरसना, जहां भीमफे साप दुर्यो- कर अश्वत्थामा पीछे पीछे दौरना, दोणपुलका मोमका धनका गदा युद्ध हुआ यहां सब लोगोंका माना, इसके भयतुर होना और योरित योधपूर्यफ 'पृथ्वी पाएदव- पाद बलरामका आगमन, सरस्वती-तीर्थ और अन्यान्य रहित हो ऐसा कहनारायणारा छोड़ना, इस पर क्षण. तोर्यो का माहात्म्य-वर्णन, इस रणभूमिमें दुर्योधनके का अश्वत्थामाको मना करना, श्यामाका पिट्टीदा माथ भीमका तुमुल गदा-गुस, गुसुस्पलमें भीमकी गहा- शरण देत मजुनका उमो सटरसे निवारण करना, अश्य. से पाँधनको जघा तोड़ना, इस पर्व में ये ही सप त्यामा मीर पायन पासका परस्पर शापका