पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/१९९

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..महायान १८५ जीवगतिका मुख्य उपायस्वरूप सभी मनुष्योंका उप-। किसांका विश्वास है, कि नागार्जुन महायान-मता. युन मत विशदरूपसे जनसामाजमें प्रकाशित किया है। वलम्बो अश्वघोपके शिष्य थे। उनका माध्यमिक मत किस समय और किस मनीषी वौद्ध यति द्वारा यह महायान मतका प्रधान सहायक हुमा था। फिर किसीका नया पथ निकाला गया था, यौद्धमाधान्यके इतिहासमें कहना है, कि ये राहुलभद्र नामक एक ब्राह्मणके शिष्य इसका कोई प्रहत प्रमाण नहीं मिलता । थे। उक्त ब्राह्मण सन्तान पहले ग्रालण-धर्मावलम्बी

बहुतेरे अनुमान करते हैं, कि शापय बुद्धको मृत्युसे | थे। पीछे उन्होंने महायान बौद्धमतको प्रहण

सौ वर्ष बाद वैशालोमे महासाविक नामक अन्य किया। साधूत्तम कृष्ण तथा गणेशके अनुग्रहसे उनके मतायलम्पी जिस एक यौन सम्प्रदायफा आविर्भाव हुआ धर्माभिव्यक्ति हुई थी। इस अस्फुट ऐतिहासिक तत्वके था, उसके स्थविरगण पूर्वतन मतके संस्कारसाधनमें रूपककी आलोचना करनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि पद्धपरिफर हुए थे। क्रमशः उसी संस्कारसम्पन्न महा उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णप्रोक्त भगवद्गीता और शैवमतका साहिक सम्प्रदायसे 'महायान' मतका आविर्भाव हुआ। अनुसरण कर महायान मतके कलेवरको पुष्टि की .१ली शताब्दीमें अश्वघोपरचित 'महायानभ्रद्धोत्तएड थो। मुतरां नागार्जुन-प्रयतित मतमें जो स्वतः शास्त्र' नामक महायान मतके उत्पत्तिविषयक प्रवन्धसे हो ब्राह्मण्याभास झलकता है, उसमें मन्देद करनेका फोई उसको प्राचीनताका आभास मिलता है। ७०.ई०सन् कारण नहीं। में अश्वघोपकारचा हुआ एफ काव्यप्रन्थ चीनदेश लाया अनेक प्रकार के प्रवादसे जाना जाता है, कि नागा. गया। सुतरां उससे भी पहले यदि अश्वघोपके आविर्भाव जुन ६० वर्ष तक जीवित रह कर सुखावतो नामक कालकी कल्पना को जाय, तो ई०सन्के पहले हो महा. | स्वर्ग में गये । अन्यान्य प्रवादफे मतसे ये पांच सौ वर्य यान मतको प्रतिष्ठा तथा प्रचार होना सम्भव प्रतीत | तक विद्यमान थे। यदि राजतरङ्गिणीका उपास्यान स्वीकार होता.है। किया जाय, तो नागार्जुन तुरूष्क राजा के परचिकालमें ली शताब्दीमें महायानमतका विस्तार सूचित होने आविर्भूत हुए थे, ऐसा अनुमान किया जाता है। पर भी यथार्शमें माध्यमिक मतके प्रवर्त्तयिता नागार्जुन | नगार्जुन देखो। से ही इसका प्रचार तथा प्रसार निरूपित होता है। महापान मतको उत्पत्ति तथा परियसिके प्रत इति- नागार्जुनके पहले यौद्ध यतियोंके मध्य वस्तुसत्ता और हासको आलोचना करनेसे मालूम होता है, कि शराज सत्तामास तथा स्थिति और ध्वंस इस मतको ले कर कनिकने साम्प्रदायिक धर्मविरोधका राउन करने के लिए वड़ा ही गोलमाल चलता था। उन्होंने मध्यपथका | ३य महासङ्घका अनुष्ठान किया। उसी समयसे ३५ अवलम्बन कर अर्थात् सिद्धान्ताभास द्वारा इसकी पर्व सम्प्रदायको यथेष्ट परिपुष्टि हुई। जलन्धरके निकटवत्तों पक्षमोमांसा और मवैपरोत्यसे मिला कर दोनों मतफा | फुधन सहाराममें, दूसरेके मतसे काश्मीरफे अन्तर्गत साइन किया, इसीलिये उनका प्रवरित मत माध्यमिक | कुसल धनविहारमें इस धर्म सभाका अधिवेशन हुआ। नामसे, प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने इस सम्प्रदायका प्रधान ___साम्प्रदायिक मतभेदफे कारण घौद्धशास्त्रसमूहको पारमिता-नामक एक उत्कृष्ट प्रन्य रचा। इसके अलापा) विटलता देप कर संस्कारामिलापी राजा कनिमने जो ये.युद्धावतंसक, समाधिराज और रत्नफूटसूत्र नामक महासमा को थी, उसके कालनिर्णयादिक सम्बन्धमें और भी तीन प्रत्यों में बौद्धधर्मका प्राधान्य कोर्तन कर विभिन्न यौनसम्प्रदायफे मध्य विशेष मतमंद देखा जाता गये हैं। महापारमितामें कितने ही स्पगोंय या माध्या- ! है। चीनपरिग्राजक यूएनचुबंग उन प्रयादोंके माधार, त्मिक युद्ध और, बोधिसत्त्वका उल्लेख है। युद्ध या ' पर जो सब घटना लिप गपे हैं, उन पर भी बोधिसत्यका यागुत्व महायान सम्प्रदायके प्रवर्तित मतसे पूरा निर्भर नहीं किया जा सकता। तिम्पनीय धर्ग. बहुत कुछ मिलता जुलता है। माध्यमिक देखो। मन्ध टिपा है, कि राजाने, साम्प्रदायिक धगंशारर- ___Vol. XVII. 47