पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२०१

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महायान १७ तथा योगधर्म में अभ्यस्त और हिन्दूदर्शनाभिज्ञ महा। माध्यमिझोंने मायावादका परित्याग कर सांख्या- यानोंका मत एठन करने के लिये हीनयानोंको भी हिन्दू- चार्य के प्रधान तथा प्रकृतिके अनुकरण पर प्रशा और . दर्शन पढ़ना पड़ा था। क्योंकि दर्शनशास्त्र । उपायको व्यवस्था की है। युति और अनुमान द्वारा सुलम न्याय, मीमांसा या युक्तिका खण्डन उन्हीं सब वस्तुसत्ताका अस्तित्व अस्वीकार करने पर भी ये यथार्थ . शास्त्रोंके ज्ञानानुकूल है। इस प्रकार परस्परमें उच्च) में वौद्धधर्मके नैतिकमार्गसे विचलित नहीं हुए। स्थान पानेकी चेष्टासे यो के मध्य चार दार्शनिक ! पहले ही कद आये हैं कि नागार्जुनने माध्यमिक सम्प्रदायका आविर्भाव हुमा। यथा-धैभाषिक, सीता- सत्ताका प्रचार किया | उनके समसामयिक फुमार न्तिक, योगाचार और माध्यमिक । लम्धने सौतान्तिक मत फैलाया था । पूर्व धर्णित उनमेंसे नमापिक और सौत्रान्तिकगण हीनयानमत- | अश्वघोष भो महायान सम्प्रदायके एक महारथि थे। फे तथा योगाचार और माध्ममिक्रमण महायान मतके | नागार्जुनफे बाद आय देवका नाम प्रसिद्ध हुआ। वे प्रतिपोषक थे। महायान-मतके प्रचारके लिये बहुतसे दार्शनिक प्रथ " धैभाषिक और सौत्रान्तिक-गण भूत, भौतिक, चित्त लिस गये हैं। इसके बाद नालन्दा विहारमें नागाहय तथा चैत्तिक इन्दी चारोंको स्वीकार करते हैं। पैभा- ( तथागतभद्र) नामक और भी एक बौद्ध स्थघिरका 'पिकोंके मतसे अमिधर्म के सिवा सूत्रकी कोई बलवत्ता नाम देखनेमें आता है। नहीं है। स्वयं शाफ्यमुनिने हो मानुपसत्ता ले कर उत्तर और दक्षिण बौद्धसमाजको अवस्था तथा 'जग्म ग्रहण किया था। ये अपनी साधनाके यलसे पृथकता देख कर फाहियान ५यों शताप्दोके मारम्नमें बुद्धत्व तथा निर्माणको प्राप्त हुए थे। अपने स्वभावज लिख गए हैं, कि अभिधर्म और विनय सेवकमण्डली शान द्वारा सत्यलाभ हो बुद्धत्वका स्वगोंय लक्षण है। अभिधर्म तथा विनयपिटकको और महायान मताय. 'सीतान्तिकगण इसके प्रतिकूलमें अभिधर्मकी उपेक्षा कर लयो प्रज्ञापारमिता, मंजुश्री तथा अयलोफितेभ्यरको सूत्रको हो प्रामाण्य पतलाते हैं। ये युद्धको दशवल, उपासना करते थे। उन्होंने पारलिपुत्र नगर आ फर चातुर्ये शारद्य तथा निमृत्युपस्धानसमन्वित और सय दो बड़े सङ्घाराम देखे थे, उनमेसे पक हीनयान और भूतों में समदयावान मानते हैं। इसके अलावा ये युद्ध- दूसरा मदायान मतावलम्बियों का वासस्थान था । महा. शरीरमें धर्मकाय और सम्भोगकायको आरोप कर गये हैं। पान सहाराममें रहते समय उन्होंने महासादिक घर योगाचार और माध्यमिकगण विज्ञानवादी थे। मतका एक सम्पूर्ण विनयनन्य संस्स्त भापा देखा ये घस्तुसत्ता बिलकुल स्वीकार नहीं करते । उनके था। मठ्यासियोंसे पूछने पर उन्हें मालूम हुआ, कि मतसे जड़जगत् प्रत भ्रमात्मक और नामरूपका महासाडिक मतफे साथ महायान मत यहुत कुछ मिलता पिकारमान है। चेदान्तवादोके पारमार्षिक 'और चुलता है। यहाँफे महायानगण अपने धर्म मतकी ज्यवहारिक सत्यको तरह घे भी परमार्थ तथा संगृति पुस्तकोंके अलाया सर्वास्तिवाद और संयुक्ताभिधर्म- 'मामक दो सत्यको स्वीकार करते हैं। संपृति प्रशा. हृदय, परिनिर्वाण, घेपुल्यसूच, भमिधर्म प्रभूति महा. "शक्ति (पुद्धि) के सिवा गोर कुछ भी नहीं हैं। इसीलिए साहिक मतपोषक प्रत्यको भी मालोचना करते थे। सभी माया भ्रमात्मक या स्वप्नसाइश है। उनके मत. री और रोशताईस पाण्डित्यपूर्ण बाँददर्शनका से पस्तुसत्ताको उत्पत्ति या विनाश नहा इ . सुतरा प्रचारत होने लगा । इस समय गान्धारयासी आर्य मात्माका जन्म पा निर्वाणलाम भी असम्भय है। । असङ्ग मोर वसुबन्धु नामक दो विण्यात बौदभाइयों का जिन्होंने निर्वाण प्राप्त किया है मौर जिन्होंने नहीं किया है इन दोनों में कोई विशेष पार्थक्य नहीं रह सकता।

माधिर्भाव हुमा।

यथार्यमें जीवदेह और भोगदेहकी सभी अवस्था स्वप्न असा पहले मदोगासक मताचारी थे।वामें ये पद है। . महायान मतमें ‘दोभित हुए। खांसनसे पहले