पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२०८

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३१९० . . पहारत्न-महारसोनपिण्ड दारचीनी, इलायची, तेजपन, नागकेशर, धानरीवीज | महरय ( स० पु० ) मदान रयो यस्य। मेक, बेंग।। ... ( अलकुशीका वीया ), गोरक्षतण्डुला, तालांकुर, केश• महारश्मिजालावभासगर्भ (सं० पु०) योधिसत्त्वभेद। राज, शृङ्गाटक, त्रिकटु, धनिया, मयरक, रांगा, हरीतको महारस (स.पु० ) महान अधिको रसोऽस्य रुचिप्रदः . ' दाख, कंकोलो, क्षोरकंकोली, पिंडखज र, कोकिलाशयोज, त्यातan त्यात् तथात्यं । . १ काक्षिक, कांजी १२ खजूर, पजूर। फटुको, मुलेठी, कुष्ठ, लवङ्ग, सैन्धव, यमानी, धन- ३ कोपकार। ४ कसेरू । .५ इश, ऊस। ६ पारद यमानी, जीवन्तो और गजपिप्पलो, प्रत्येकका चूर्ण २/ पारा। कान्तलौह, कांतीसार लोहा। ८ हिंगुल, तोला डाल दे। अनन्तर यथाविधान यह मोदक तैयार | ईगुर । । स्वर्णमाक्षिक, सोनामक्खी। १० अम्रक ११ हो कर जब ठण्डा हो जाय तब उसे सुगंधित करनेके रौप्यमाक्षिक, रूपामखो। १२ जम्बूस, जामुनका पेड़। . लिये २ पल मधु तथा मृगमद और कपूरका चर्ण छोड़। (त्रि०) १३ महारसविशिष्ट, जिसमें खूब रस हो । दे। इसका सेवन करनेसे रक्तपित्त आदि विविध रोगों-1, महारसवत् (सं० वि०) १ उत्कृष्ट आस्वादयुक्त, जिसमें को शान्ति तथा वल, वीर्य और रतिशकिको वृद्धि होती! । वढिया स्वाद हो। (पु०) २ खाद्यविशेष। . . . ' ' है। (भैपज्यरत्ना० वाजीकरणाधि) महारत (सं क्ली० ) महत्व तत् रत्नञ्चति । मुकादि नव- महारसशार्दूल (सं० पु०) रसोपविशेष । यनानेका : रत्ने। मोती, होरा, चैदुर्य, पद्मराग, गोमेद, पुष्पराग, | तरीका--शोधित अयरफ, तांवा, सोना, गंधक, पारा । मरकत, प्रवाल और नीलरत्न पे नौ प्रकारके महारत्न हैं। मैनसिल, सोहागा, यवक्षार, हरोतकी, भायला और . वहेड़ा प्रत्येक ८ तोला दारचीनी, इलायची, तेजपत्र, .. महारत्नप्रतिमण्डित (सं० पु०) कल्पभेद । महारत्नमय ( स० त्रि०) महाय रत्न-विशिष्ट । जैत्री, लवङ्ग, जटामांसी, तालिशपतं, स्यर्णमाक्षिक और महारतवत् .( स० वि०) महाध्य रतसम्पन्न । रसाजन, प्रत्येक ४ तोला । पान और गोमा सागमें सात : महारनवर्षा (स० स्रो०) तान्त्रिोंकी एक देवीका वार भावना दे कर उसमें ८ तोला मिर्च छोड़ दे। इस.. का अनुपान और माता दोपके वलायलके अनुसार स्थिर .. नाम। करनी होगी। इसका सेवन करनेसे सूतिकारोग, ज्यर, महारथ (स० पु० ) रमन्ते लोका यस्मिन्निति रम ( हनि | पिनीरमिका शिभ्यः कथन् । उण २।२) इति कथन, महां- दाह, यमिभ्रम, अतीसार, अग्निमान्य मादि रोग जाते . रहते हैं। (रसेन्द्रसारसंग्रह सूतिकारोगाधिकार) - श्वासौ रथश्चेति । १ शिव । महान् कथोऽस्य । २ अयुत धन्वीफे साथ अस्त्रशस्नमें निपुण योद्धा महारसाटक (सं० लो०) महारसानां अष्टकम् | अष्ट धात. एको दशसहस्राणि योधयेद् यस्तु धन्विनाम् । . .विशेष। पारद, अभ्रक, हिंगुल, धैकान्त, स्वर्णमाक्षिक, अस्त्रशस्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः ॥" रौप्यमाक्षिक, शङ्ख और कान्त लौह यही अष्ट धातु हैं ! (गीताटीकामें स्वामी) दरदः पारदः सस्यो वैक्रान्त' कान्तमभाम् । . ., जो अकेला दश हजार योद्धाओंसे लड़ सके उसोको .. मानिक विमान ति स्युरेतेऽष्टौ महारसा ॥" (राजनि०) महारथ कहते हैं। महान् स्याः। ३ घृहद रथ, पड़ा महारसोनपिण्ड (सं० लो०) आमवात रोगको श्रीपर- रय। ४ राजविशेष ',' विशेष । प्रस्तुत प्रणाली-लशुन १०० पल, विना भूसी. महारथत्व ( स०को०) महारयस्य भाव त्व । महा के तिल ५० पल, इन्हें मह के साथ पीस कर १६ सेर रयका भाव वा धर्म, महारथका कार्य । . , . गायफे दूध में मिला दे। पीछे उसमें विकटु, धनिया, महारथी (संपु०) मारय देखो। चश्य, चितामूल, गजपीपल, पनयमानी, दारचीनी, महारच्या (सं० स्त्री०) राजपथ, प्रधान रास्ता। इलायची और पिपरामूल, प्रत्येक १ पल, चीनी ८ पल, महारम्म (सं० क्लो०) १ लवण। (लि) २ जिसका मिर्च ८ पल, कुट, ४ पल, मंगरेला ४ पल, मधु ४ पल, मारम्म करने में बहुत अधिक यन करना पड़े। । अदरक, ४ पल, घी २ पल, तिलतल ८ पल, शुक्का