पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२१३

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महाराष्ट्र १९५ जनसंख्या करीब तीन करोड़ है। महाराष्ट्र प्रदेश कांश पन्धुर, जङ्गलमय तथा दिनमजन्नुसे परिपूर्ण साधारणतः पथरीला और उपजाऊ है। यहाँका जल है। वर्षाकालमें यह प्रदेश पदा हो अरावना मालूम वायु भारतवर्ष के अनेक स्थानों के जलवायुको अपेक्षा' पड़ता है और यर्षाके अधिकांश समयमें यदा बदली स्थास्थ्यकर है। छाई रहती है। यहांकी गिरिशिखरमालाएं इस प्रकार प्राकृतिक भ्या, । अवस्थित है, कि थोड़े परिश्रमसे हो ये सब अत्यन्त सापर्यंत महाराष्ट्रदेशको पूर्वपश्चिम दो भागोंमें दुर्भद्य दुर्ग में परिणत की जा सकती हैं। घाटमाथाको वांटता है। उनमेंसे पूर्वाञ्चलका नाम 'देश' और पश्चि.' शिवरायली पर आज भी छत्रपति शिवाजीफे धनापे . माञ्चल 'कोङ्कण' है। शेषोक्त प्रदेशको लम्बाई उत्तरमें , सिंहगढ़ प्रभृति सैकड़ों दुर्ग नजर आते हैं। ऐसा दमनगङ्गासे ले कर दक्षिणमें सदाशिवगढ तक लगभग , सुदृढ़ प्रदेश पृथ्वी पर बहुत कम दंपने में भाता है। इस चार सौ मील है और चौड़ाई कुल मिला कर ५० मोल । प्रदेश मनुष्य स्वभावतः मृगयाफुशल, लक्ष्यवेधमें निपुण है। यह प्रदेश अत्यन्त वन्धुर, अनुचर तथा बलशाली, साहससम्पन्न और धर्म में गमीर विश्वासयुक्त पर्वतोंसे परिपूर्ण है। फोडणका जो अश पश्चिमघाट हैं, इसमें सन्देह नहीं है। गिरिमालाफे समीप अवस्थित है, उसे 'कोहणघाटमाथा': कोकण घाटमाथासे उतर कर पूर्व की ओर जानेमे कहते हैं। घाटमाथाका पाददेशस्थित भूभाग वोल. फ्रमशः शैलविरल, नदनदोसमन्वित, सुविशाल और चालमें “तलफोडूण" या निम्न कोडूण नामसे प्रसिद्ध कही कहीं समतल क्षेत्र देखने में आता है । इस प्रदेश, है। यहाँफे अधिवासी साधारणत: सरलहृदय, फाए- को महाराष्ट्रीयगण 'देश' कहते हैं। देश या पूर्य महा. सहिष्णु, उद्यमशील, शिकारो तथा शान्तप्रकृतिके हैं। राष्ट्र देश कोहणकी तरह असर नहीं है। साप्ती, गोदा. विस्तृत विवरण फोक्षया शब्दमें देखो।। घरी गौर कृष्णानदी तथा घंपागद्गा, नोरा, मीमा, मजिरा कोडणके पूर्व पश्चिाघाटपय त.भी अपनी विशाल आदि उपनदियां पूर्य महाराष्ट्रदेशको पुछ कुछ उपजाऊ देहको ऊंचा फिए हुए प्राचीराकारमें अवस्थित है। इस पनाती है। फिर भी वर्षाकालफे सिया दूसरे समयमें इस ..पर्वतका दृश्य अत्यन्त गम्भोर, भयानक और सुन्दर है। प्रदेशको अधिकांश भूमि मरूभूमिकी तरह उमिन्नशन्य कहीं ओपधिपूर्ण शैलश्रेणी विद्यमान है, कहीं सात | रहती है। इस अञ्चलमें जाड़े, गर्मी और तूफानका महीने तक धा हो होती रहती है और कहीं यन्यः प्रकोप भी कुछ कम है। धान, गे, ज्यार और वाजता अन्तुओंका भोपण गर्जन हमेशा सुनाई देता है। इस यहांकी प्रधान उपज है। ईप, कपास, नीनाबादाम और प्राचीरवत् शैलश्रेणोमें कदों कहीं पर मनुष्योंके आने संयाकी खेती तथा विक्री होती है। जाने के लिए कई एक बहुत संग रास्ते हैं जो 'घार' कह पूर्व महाराष्ट्रप्रदेश भी एकबारगी पर्यंत शन्य नहीं लाते हैं। पे सब पार्यत्यपथ अत्यन्त विप्नपूर्ण धीर है। "चान्दोर गिरिभ्रेणी" "मदनगर शैलमाला" दुरारोह है। स्थानीय मनुष्यों के मिया दूसरे कोई भी "शम्भूशिम्परावली" धीर पूनाको दक्षिणस्थित शैलपंक्ति, उस पथसे विचरण नहीं कर सकते। इस सदर इन चारोंने मुदृढ़ प्राकारकी तरह महाराष्ट्रनिको मेय मय रास्तेको पार कर सहाद्रिके समीप जानेसे पर्यत बना रणा है। यह प्रदेश दश जिलोंमें चिमना है। मोर यनसे घिरे हुए अनेक छोटे छोटे गांव नजर आते | गोदावरी, भीमा, मीरा और माननदोर्फ तोवती हैं। यद भूमिपण्ड 'कोडूणघाटमाथा' (शीर्ष ) काह, प्रदेशाम बड़े ही सुन्दर महारट्री घोडे पाये जाते है। लाता है। इसीका पफ मी "मालय" नामसे प्रसिद्ध! पे घोड़े छोटे कदके, गुमयर, भत्यन्त कष्टसहिष्णु मार है। महात्मा शिवाजीको मालवी-सेना इसी प्रदेशसे भारी वोझ ढोने तथा पर्य समय प्रदेश में बहुमतेम चलने- संग्रदोत दोती थी। घाटमाथाको चौड़ाई कहीं मी पाले होते हैं। महाराष्ट्रोंके सभ्युदयफे पक्षमै पेपट २०-२५ मोलसे ज्यादा नहीं है। इस प्रदेशका अधि- दो कामफे हुए थे।