पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२२७

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पहाराष्ट्र २०७ - आद्योपान्त विवरण लिख कर आधुनिक ऐतिहासिकोंके । देवके कौन कौन गुण अलौलिक नही थे?" उक्त महा. धन्यवादभाजन हुए हैं। पण्डित-प्रोत परमहंमप्रिया, शतश्लोकचन्द्रिका, कयि. हेमाद्रि यत्सगोत्रीय ग्राह्मण थे। उनके पिताका कल्पम और उसको टोका, रामण्याकरण तथा काकाम नाम कामदेव, पितामहका यासुदेव और प्रपितामहका धेनु प्रभृति प्रन्यों का उल्लेख भी मिलता है। नाम वामन था। उनके यहां विद्वान् पीर पण्डितों को योपदेय फेशव नामक वैधके पुत्र और धनेश पण्डित अच्छी स्वातिर थी । ये धर्मनिष्ट, मदाचारसम्पा और के शिष्य थे। इनके पितो और गुरु दोनों ही विदर्भ पराकमशाली कहे गए हैं। उनके चतुर्नचिन्तामणि- देशके अन्तर्गत परदा नदीके किनारे सार्ग नामफ. के जैसा विविध धर्मविषयपूर्ण प्रकाण्ड अन्य संस्कृत गांवमें रहते थे। ये देशी प्रामण ये । मदाराष्ट्फे भाषामें बहुत कम देखने में आता है। बागभटके वैद्य. मादिकवि और साधु पुरुष पानेभ्यर जय समाजच्युत विषयक प्रन्धको आयुर्वेद-रसायन नामक एक प्रसिद्ध हो गए, तय उनके दाद उन्हें सारे ग्राह्मण समाजको मोर टीका है। जनसाधारणका विश्वास है, कि हेमाद्रि हो से जो शुद्धिपन मिला था, उसको रचना थोपदयने हो उसके रचयिता थे । योपदेयके मुक्ताफल नामक की थी। इनके चंगधरगण आज मी येरार अञ्चलमें वैष्णव मतप्रतिपादक प्रन्यको एक टीका हेमाद्रिने ही. विद्यमान है। कोई कोई चोपदेयको चंगीय चैधयंशजात बनाई है। महाराष्ट्रीय वग्यानित्रयमें ये "हरिभक्तिपरायण समझते हैं किन्तु यह अनुमान विलकुल मिथ्या है। हेमाडपन्य" नामसे प्रसिद्ध है। इन्दोंने सिंहल या भारत- यथा ये मराठी ग्रामण थे । वैद्यगृत्तिको महाराष्ट के दक्षिण सीमान्तवत्ती प्रदेशोंसे वर्णमाला संग्रह कर देगर्म याज भी अति उच्च श्रेणोके ग्राह्मणगण अवलम्बन महाराष्ट्र देशमें उसका प्रचार किया था। यह वर्णमाला · करनेमें कुण्ठित नहीं होते । किन्तु महाराष्ट्रमें वैध नामक अति शीघ्र लिखने में बड़ी उपयोगी है। चपरकारों ने इसे कोई स्वतन्त्र जाति नहीं है। राक्षसोलिपि बतलाया है। हेमाद्रि स्वदेशमै गट्टालिका.. महाराष्ट्रदे शके मादिकवि मुकुन्दराज, शानेश्वर निर्माणकोएक अभिनय प्रणालीका प्रयर्शन कर म्यदेश ' और नामदेय प्रभृति यादयचंशियों के राज्यकालमें प्रादु. यासियोंके निकट चिरस्मरणीय हो गये हैं। शोलापुर भूत हुए थे। उनमेंसे मुकुन्दराज पूर्ण यर्णित जैत्रपाल जिले में उनकी प्रवर्तित प्रणालोके अनुमार बने हुए कई राजाके दीमागुरु थे। इस रामाको भनाचार्गका एक मन्दिर बाज भो विद्यमान है। अत्मत सिखाने के लिये उन ग्राह्मण कायने वियफ सुप्रसिद्ध व्याकरण व्योपदेव भी उमो समय प्रादुर्भूत सिन्धु नामक प्रस्य रचा था। ज्ञानेश्वग्ने धीमद्भाग- हुए थे। हेमाद्रिके अधीन बहुत से पण्डिौमसे यह एक चदीताकी एक बड़ी टीका प्रणप की है। इस टीका थे। मुग्धवोध और मुक्ताफल नामक अन्यके मिया हरि- उपसंहारमें महाराज रामचन्द्रको राजधानी देवगिरिका लीला नामक एफ और अन्य वोपदेवका रचा हुआ है। वर्णन है। यह टीका ज्ञानेश्वरी नामसे प्रसिद्ध है और शेपोक्त दो अन्य हेमाद्रिके अनुरोध लिग्ये गये थे, ऐसा १२१२ शझमें रची गई है। नामदेव शानेभ्यरफै समसाम- स्वयं अन्धकारने स्वीकार किया है। आयुर्वेद सम्बन्ध यिक धे।जान पड़ता है, किमहाराष्ट्र देशमें ये मनिमार्ग- में उनके का एक अन्य इस देशमें प्रनलित हैं। पोपदेय , के प्रथमप्रवर्तक ये और सपने पहले उन्होंने दो मराठी के मुक्ताफलकी टीका होमाद्विने प्रन्यकारको इस प्रकार भागमें भक्ति तत्य रचा था। उनकी प्रणीत अमर (गोति). वर्णना की है, जिनके व्याकरणमें भक्त कीर्ति, ध्याकरण माला मान भी मदाराए यामी पाल पर पणिनाफे विषयमें जिनका दश प्रबन्ध, पेदानन्धके ऊपर नी प्रयन्य, मुपर मुनी जाती है। नामदेवफे परिपारमें ममी मस.. फर्मशास्त्र विषयमें तिथिनिर्णय नागफ एक प्ररथ, साहित्य कवि थे। उनकी नी, कन्या, पुत्र, मा यहां तक कि सम्बन्ध सीन अन्य और भागवतफे नोग प्रवन्ध है. उन जना नामको दागीने भी भनि-मूलक कविताको रगना अन्तर्गशी "कोविद गळ:पर्णत" महामहोपाध्याय योप- ' को है।