पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२८१

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महाराष्ट्र २४६ प्राम्य स्वास्थ्य-रक्षा, व्यवसाय-वाणिजामें उत्साहदान, वर्तमान समयको तरह उस समय भी सामरिक शिक्षाविस्तार और उन्नतिविधान प्रभृति विविध कार्य विभागके व्ययको अधिकतासे राजकोषको अवस्था किस तरह सम्पादित होता था। किन्तु इतिहासमें अति शोचनीय रहती थी तथा जातीय मणका परिमाण . इन सब बातो का कही उल्लेख दिखाई नहीं देता।। बढ़ाना पड़ता था । गत शतान्दोके आरम्भकालमें फिर, उस समय इन सब कामोंका भार पेशयों पर था अपनी क्षमता और स्वाधीनता ठीक रखनेके लिये मर- धौर पेशवा विशेष दक्षतासे यह सय काय निर्वाह करते । हठो को युद्ध करना पड़ा था। इससे इनका खजाना .थे। यह बात पूनाफे राजदसरके कागजातोसे मालूम । प्रायः सभी समय खाली रहता था। पहले बाजीराव . होती है। आदि महाराष्ट्र नेतृवर्ग भी उत्तर-भारतकी याला करते. प्रजापालनके विषयमें पेशोंने कभी भी अपनो के समय ऋण लेने पर वाध्य होते थे। सन् १७४० ई०- योगिता प्रकट नहीं की है। अन्तिम समरामें विविध से १७५६ ई० तक वालाजी याजीरावको सैकड़े वार्षिक विषयों में पूर्व व्यवस्थाका व्यतिफम देने पर भी राजस्व १२ रुपयेसे १८ रुपये तक सूद पर डेढ़ करोड़ रुपया ऋण वसूलके सम्बन्धमें पूर्व नियम अक्ष पण था। महाराष्ट्र, लेना पड़ा था। पानीपतके युद्धमें मरहठों की विशेष राज्यों में कर वसूलीके लिए प्रजा पर कभी जुल्म या ! क्षति होनेसे प्रथम माधवराव जातीय ऋण चकानेकी अत्याचार किया न गया, करकी रफम भी प्रजाके लिये कोई विशेष व्यवस्था नहीं कर गये । वल्कि जिस समय . किसी तरहसे दुर्वह न थी। घरं प्रज्ञा प्रसन्नताके साथ वे मृत्युशय्या पर पड़े थे, उस समय मन्त्री मण्डलको • कर चुका देती थी। फर वसूलीकी व्यवस्था भी प्रजाके ढाई करोड़ रुपयेका ऋण चुकाना पड़ा था। इसके बाद • लिये कटकर न थी। इसके लिये पेशवोंको प्रशसा नानाफड़नवीसको व्यवस्थाके फलसे प्रायः सभी ऋण बीमारिए। जमीनकी मालगजारीकी वसूलीकी चुक गया था. केयलमाल कई लाख रह गया था। अतिम । तरह शुल्क अदाय करनेकी व्यवस्था भी कटकर न वाजीरायके समयमें केवल ऋणको चुका ही नहीं दिया थी। दुकानदारों तथा समुद्रतीरवती तम्या और गया था परं राजकोपमें धन भी पहुत एकत्र हो नमक व्यवसायियोंसे बहुन थोड़ा शुल्क लिया जाता था। गया था।

नमकका शुल्क कहीं भी वीस मन पर 1) से अधिक विद्याशिक्षा में लोगों के उत्साह पढ़ाने के लिये पेशवा

न था । कहीं कहीं तो १०) आने दे कर नमकके। बहुत धन खर्चा करते थे। घेद-शानके अध्ययनकारी प्ययसायी छुटकारा पा जाते थे। उस समयकी तुलना , राजकोयसे वृत्ति पाते थे। भारतके प्रायः सभी प्रदेशके करने पर हमें इस समय उससे २७ गुणासे ३० गुणा | लोग घेदाध्ययनके लिये पृत्ति लेने महाराष्ट्रमें आया • तक शुल्क दे कर नमक खाना पड़ता है। सिया इसके फरते थे। पूनाफी परीक्षामें उत्तीर्ण हो कर जो पर. नमक तय्यार करनेका व्यवसाय पेशवोंके एकाधित न स्कार प्राप्त करते थे उनका समन भारतमें नाम हो जाता था, इससे भी लोगों पर अत्याचार या मतिचार होनेकी ! था। इसीलिये पूनाकी परीक्षामें परीक्षार्थियों में प्रति- सम्भावना न थी । ताल, खजुरे आदि रसों पर जो द्वन्दिता होती थी। इस पुरस्कारके कार्यमें मरहठे ६० कर निर्धारित था, यह भी अत्यन्त अलग था। किन्तु हजार रुपये सालाना खर्च किया करते थे। अन्तिम पेशया देशके लोग मद्यसेवी न बने, इस विषय पर पेशवों का बाजीरावफे समयमै सव तरहके दान धर्ममें चार लाख विशेष लक्षा था । विदेशसै जिन मालों को आमदनी | | रुपया खर्च होता था। संस्कृतके विद्यार्थियोंके सिवा यहां होती थी, पेशवागण उससे महसूल लेते थे। किंतु | अन्य किसीको भी वृत्ति पानेका हक न था, तो भी कितने इसका भी परिमाण बहुत कम था। सिवा इनके और ही कपि, पुराणपाठक, आदि लोग कुछ न कुछ पृत्ति • किसी तरहका कर राजाको भोरसे वसूल नहीं किया | पाते थे और कभी कभी उन्हें गुणानुसार पुरस्कार को 'जाता था। . . . मिलता था । फलतः गुणी मात्र ही पेशवाद Tol. XVII, GS