पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२८४

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२५२ महाराष्ट्र : मुसलमान शक्तियोंको चूर्ण कर राजारामने महा- लिये हुपम लेते थे, उन लोगों को १२० १० देना पड़ता .. राष्ट्रदेशको राजधानी सतारामें वसाई । किन्तु यह था। सिवा इसके उतने समयमें जितना रुपया चलना मालूम नहीं होता, कि यहां उन्होंने कोई टकसालघर भी था, उन रुपयों की संख्याके हिसायसे लोगोंको कुछ यनाया था या नहीं। सन् १७१२ ई० में महाराष्ट्रदेश राजकर भी देना पड़ता था। दो भागोंमें विभक्त हुआ। महाराज शाहु सतारेमें और ___महाराष्ट्रदेशके बाहर मरहठे राजाओंको तुफमसे जो राजारामके पुत्र सम्भाजी कोल्हापुरमें रह कर देशका टकसालघर स्थापित किये गये थे, उनमें धारयादका शासन करते थे। इन दोनों राजधानियों में ही एक एक टकसालघर ही सयसे पहला था। यह सन् १७५३ १०. टकसालघर बना था। शाहुके नामका चांदी तथा ताये में प्रतिष्ठित हुआ था । :याघलकोटमें आदिलशाही का सिका "शाहुःसिका" और सम्माजी रफसालका सिमा ढलता था, किन्तु आदिलशाहोफे नाश होने के ढला सिका "शम्भू सिका" कहलाता था । सन् १७८८ ई० साथ साथ सिकेका ढालंना भी बन्द हो गया। पालाजी तक कोल्हापुरके राजाओंका राजसिंहासन प्रधानतः याजोरावने पेशवोका पद प्राप्त कर फिर रुपया ढलयाना । पहालाके किले में ही था । जय तक कोहापुरमें राजधानी शुरू कर दिया। सबसे पहले इस यातकी मोर पेराया. कायम न हो गई, तब तक कोहापुरके राजाओंका टक- की दृष्टि आकृष्ट हुई थी, कि रुपयाके लिये लोगों को सालघर पहाला किले में हो रहा । इसी कारणसे सम्भा- किसी तरहको असुविधा न होने पाये। . जोका रुपया पहाली रुपयेके नामसे भो मशहर है। 'शंभू । | माधवराव पेशवाके समयमें भी राज्य के विविध सिका कहीं कहीं 'शम्भूपीररुपया' के नामसे भी विख्यात स्थानों में रुपया ढाला जाता था। इनके वादफे पेशयों- था। राजा शम्भू ( सम्माजी ) के नामके साथ पोर फे समय में भी इसकी कमी न होने पाई। फेयल साहु शब्द कैसे जोड़ा गया, इसका पता नहीं लगता। चाहे - महाजनों पर ही रुपया ढालना निर्मर न था कि । जो हो, महाराज सम्माजीकी मृत्युके बाद भी कोहा- पेशयोंने सरकारी सरदारों और जागौरदारीको भी रुपया पुरके टकसालघरमें शम्भूसिका ढलता रहा। किन्तु ढालनेका हुक्म दिया था खानदेशके धन्दवाड़में तुकोजी इसके बादके कोहापुरके राजाओंके नामसे कोई सिका होलकरको टकसालघर खोलनेका हुक्म दिया गया दलता था या नहीं, इसका कोई प्रमाण अभी तक नहीं था। बुरहानपुर आदि स्थानोंम सिन्धियाका टकसाल. मिला है। घर था । उत्तर-भारतमें उन्नयिनो, इन्दोर, भूपाल, प्रताप महाराज शाहुके समय सतारामें भिखाजो नायक | गढ़, भिलसा, सिरोक्ष, गावसोदा आदि स्थानों में भी और परशुराम नायक आदि कई शाहुकार या महाजन थे। पेशवाफे छुपमसे टकसाल घर कायम हुआ था। मौनमें छत्रपति शाहु, प्रायः इनसे आवश्यकता पड़ने पर कर्ज लिया शिन्दे, फुलावा आंग्रे, नागपुर में नौसले मादि सरदागेने करते थे। कभी कभी रुपयेके अभावमें टकसालमें रुपये टकसालघर यनवाया था। आपके टकसालयरमें जो हाल कर इन लोगोंका फर्ज चुकाया जाता था। पीछे जिस | सिका ढाला जाता था, यह 'श्रीसिया' कहलाता था। प्रकार धीरे धोरे महाराष्ट्र-साम्राज्य विस्तार होता गया . हबसियोंके जजोराग बसानी या निशानी सिका उसी तरह टकसालघरको संख्या भी बढ़ती गई। पेशवा दलता था। इस सिफ्फे पर 'ज' अक्षर बुदा दुभा रहा बालाजी बाजीरावके जमाने में राज्यफे यहुतेरे स्थानोंमें | था। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि 'ज' गर लोगोंको या साद महाजनों को टकसालघर बनवानेका जजीरा सन्दका घोतक था। फोकूण, नासिक और हुपम दिया गया था। पास तौर पर २१५ते २७० रुपये दौलतावाद प्रान्तमें पेशयाफे मरदार तथा पेशयासे हुपम समाजाको नजराना देकर लोग सिमा ढालनेका हुपम ले कर महाजन लला करते थे। . ले लेते थे। किन्तु इसकी गवधि होती थी और कर्नाटक .. निहिए नजराना भार भी तीन वर्ष से अधिक नहीं, किन्तु जो लोग एक- देकर . .. प्रदेशमें सायासाला