पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/२८६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


महाराष्ट्र नामक केवल एक काय्य मिला है। मनोहारिता तथा , - दिसाई देता है। मोरोपन्त भी उसी युगके दूसरे २r. . अन्यान्य गुणों में यह अन्य मराठी भाषा अद्वितीय है। कवि हैं। रामजोशीके सिवा उस समय मोरोपन्तया । सुन्दर वर्णनाकौशल, श्रुति मधुर पदविन्यास, अल ! और कोई समकक्षी न था । मोरोपन्तको धर्मनीति. हार प्राचुर्य और अन्तःकरण वृत्तिका विश्लेषण इस मूलक कविताने वियेक कुपथगामी 'रामोशीको प्रन्थ में जैसा दिग्बाई देना है, मराठी साहित्यमें ऐसा | सत्यपथमें प्रवृत्त किया था। काल पा.कर रामजोशी । फहीं दिखाई नहीं देता। मुफ्तेश्वरके सिवा अन्य कई मोरोपन्तके एक पपके भक्त बन गये । मोरोपन्तके . भो कवि काव्यकला रघुनाथ पण्डितको समता करनेमें / सहायरसे उनको कविताको गति बदली भोमियाजी. समर्थ नहीं हो सकते । 'बलिदान' और "वावण गर्वपरि- रावने उनकी कविताको अपाच्य कहा था इसलिये उन्होंने हार" के रचयिता चतुर सयाजी भी इसो समय हुए हैं। कविताका प्रचार करनेका भार अपने ऊपर लिया। इसके बाद महोपति हुए हैं। ये महाराष्ट्र देशमें रामजोशीके वाद अनन्त पन्तीका नाम लायनी'. सर्वप्रिय प्रन्यकार हो गये हैं। श्रीधरकी तरह महीपतिः । बनानेवाले कवियों में पहले लिया जाता है । इस ' की प्रन्थावली मी महाराष्ट्रमें मावाल-वृद्ध-वनिता समी समय उनको कविता राना शक्ति असाधारण थी। भक्ति और आदरके साथ पढ़ा करते हैं। मक्तयिजय, | उनकी कविता सुननेके लिये वोस कोससे लोग आते मन्त्रविजय, भक्तलीलामृत और मन्तलीलामृत-इन चार थे। उनकी सरस कविता सुन कर फोघान्वित महरा प्रन्यों में मारतवर्ष के अधिकांश भक्तों की जीवनी महीपति- - याईने सन्नतासे उन्हें एक दुशाला उपहार दिया था। . ने यात सरल भाषा में लिखी है। इनको महाराष्ट्र धर्म- अनन्तफन्दी बहुत स्पष्टवक्ता थे। एक बार उन्होंने इतिहास प्रणेता करें तो कोई अत्युक्ति न होगी। कथा. बाजीरावकी कार्य प्रणालोको तीन निन्दा कर खुली सारामृत नामका दूसरा भी इनका एक बड़ा ग्रन्थ है। सभामें सबको चकित कर दिया था। उन्होंने "माध्य. सन १७७६ ई०में महीपतिकी मृत्यु हुई । 'महीपतिके निधान" नामक काथ्यमें माधवरायको मृत्यु कहामी. साथ साथ मराठी साहित्यके घल, दर्प और सौभाग्य का वर्णन किया है। इस समयके लायनी बनानेवालो. ' शोभादिका विलोप भी मारम्म हुआ | मरहठोंके में होनाजी, सन्गहाउ आदि कवियों का नाम उल्लेखनीय : - शक्तिसागरमें मानो 'भाटा' मा गया। उनके रष्ट्रीय है। इन लोगोंकी बनाई कविताओं में भादिरस और . गौरव-सूर्य अन्तिम पेशवा बाजीरावके जघन्य कार्य: असारताको अधिकता दिखाई देती है। संस्कृत नाटक फलाप देख कर मधोमुखो हो गये। समाज में विलासिता | और मर्मट मादिकी कवितामों में अश्लीलता इस समय तथा स्वार्थपरताका प्रसार बढ़ गया। स्वत्व गुणप्रधान रावजी की कृपास मराठी साहित्यमें घस गां। फिर भागवत धर्मका हास हो कर तामसिक शाक्तसम्प्र. | भी वोररसपूर्ण कवितायें या रणगान इस समय कम ग दायका प्रादुर्भाव हुमा । इस समय जो सब कवि हुए रचे गये। पानोपतका युद्ध, गुर्दका युत, पेशवाओंका “उनमें शाक प्रवर 'रामजोशी' श्रेष्ठ माने जाते हैं । अपने सैन्याल और मराठे सरदारोंका पोरत्य आदि विषयों का ।ड़ा, छन्द, लावनी, ४ कुपकुर, ४ थान, २ मैना, एक ) सम्बद्ध होता था। इन गानके इनानेवालोमै 'प्रभाकर अविधा और उनके लिये रचित रेशमी दोला तथा 'दाता' सबके शीर्षस्थानीय है। पूनाके निकटको शैलीमा नृत्यकुशल बालक और खानी मादि बाजेके साथ का वर्णन, पेशवानोंके दानसागरका वर्णन, दूसरे माधय उन्होंने बाजीरावकी सभा विशेष प्रतिष्ठा पाई रायका होली खेलना उनको मृत्यु, पेशवाओं का पेय .. थी । उनको पदावलीके माधुय पर मुग्ध हो । सम्भ्रम, उनका मापतन, अन्तिम माजोरायका दुराचार, .फर पहुसेरे। उनके मक बन गये थे। ये सुपण्डित. नानाफवनयोत तथा अगरेजों का वर्णन, साताराका मसाधारण 'श्रीमान् और संस्कृत भाषाके ममं ये। मागना, पूनासा शिकस्त होना, अंग्रेजोका पूनाको लूटना 'छका पहति' प्रथमें उनके संस्टन्तको अहमुत योग्यता सामान्य वणिम जाति द्वारा मरहठों जैसे बोरों हो परामप