पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३२२

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२८२ महिपासुरसम्भव--मही विध्वस्त किये गये । अन्तमें महिपासुरने स्वयं विपुल- महिपीतक (सं० क्ली० ) #सके दुधका महा। गुण- वीर्याको आश्रय कर नाना मायावी मूर्तिसे भीपण लोम- कफवर्द्धक, कुछ गाढ़ा तथा प्लीहा, अर्श, प्रहणीदोप और हपण युद्ध प्रारम्भ कर दिया । कोपारुणनयना देवी । अतीसारमें लाभदायक । चण्डिकाने महिषासुरके दौरात्म्यसे तंग तंग था कर महिपीदधि (स. क्लो०) भैसका दहो। गुण--मधुर, खड गसे उसका शिर काट लिया। दुर्वत्त महिपासुरके | रक्तदोपकर, कफ तथा शोफहर, पित्त और वातवर्गक । मारे जाने पर असुरोंकी सेनामें कुहराम मच गया। देव. महिषीदान (स' लो०) महिप-लिदानरूप प्रक्रियाः .. गण बड़े प्रसन्न हुप । सोने मिल कर चण्डिकाको मेद । पूजा की। महिपोदुग्ध (स० को०) भैसका दूध। गुण-स्निग्य, महिपासुरसम्भव ( स० पु०) भूमिज गुग्गुलु, जमोनसे यायु, शीतकर, तन्द्रा और निद्राकर, पृप्यतम, अमन, बल- उत्पन्न गुग्गुल। प्रद और पुष्टिकर। .. महिपासुरहन्त्री (स० स्त्री०) दुर्गा। | महिपोपाल (सं० पु०) महिपोपालनकारी, मैं सको पोसने.. महिपो (सं० स्त्री०) महिपस्य कृताभिपेकस्य नृपस्य | चाला ग्वाला। । । पत्नी (पुयोगाख्यायो । पा ४११४८ ) इति डीप । मृता- महिपोप्रिया (स. स्त्री० ) महिषीणां प्रिया । शूलोहण, मिपेका राजपत्नी, पटरानो। जिस पतोके साथ राजा शूली नामक घास। अभिशित होते हैं उसीको महिषी कहते हैं। राजाकी महिपोमाव (सं०ए०) महियाभावः । महिपोका भाव। पतीमात्र ही महिपो नहीं कहला सकती। महिषिमूत (सं० लो०) भैसका मूत। गुण-तिक्त, .' "इत्य व्रत धारयतः प्रजार्थं समं महिष्या महनीयकीत्त । सात व्यतीयरिंगुणानि तस्य दीनानि दीनोदरपोचितस्य ॥" कटु, कपाय, भेदक, वातनाशक, पित्तवद्धक, कुष्ठ, अर्श, . (घु १२५) पाण्ड, उदररोग और शलनाशक २ सैरिन्ध्री । ३ औपधिमेद। ४ महिपपतो, भैंस । महिपेश ( स० पु० ) १ महिषासुर । २ यमराज ।। पर्याय मन्दगमना, महाक्षीरा, पयस्विनी, लुलापकान्ता, महिपोत्सर्ग (सं००) एक प्रकारका यश । ' कलुथा, तुरङ्गद्विपणी। इसके दूधका गुण मधुर, पोनमें महिष्ठ (सं० वि० ) अतिशय महान्, बहुत बड़ा । . ढढा, गुरु, वल और पुष्टिप्रद, गृप्य, पित्त, दाह | महिष्मत (स० वि०) १ महिपयुक्त, जिसे मैंस हो। पु०) और अननाशक ; दधिका गुण मधुर, स्निग्ध, श्लेष्म- २ एक राजा। कारक. रक्तापत्तनाशक, चल आर अजयदक, वलकाराला या धनवान महिमतो (सं० खो०) गिराको लड़को। भ्रमध्न; मक्खनका गुण-कपाय, मधुररस, शीतल, बल-! । महिप्पत ( स त्रि०) १ महनाय, पूजा करने योग्य। . फर, पित्तन, स्थौल्यकारक। घोका गुण धृतिकर, सुखद, कान्तिवक, पातश्लेप्मनाशक, वलफर, वर्णवद्ध का २ महोत्सव युक्त। प्राणोविकारनाशक, मन्दानलोहोपक, चक्षु का दीप्ति- महिसुर-दक्षिणभारतके अन्तर्गत एक प्राचीन हिन्दू-राज्य... और जिला । विशेष विवरण मेयर शब्दमें देखो। . . वर्द्धक तथा मनोहारक। इसके मूलका गुण मानाह शोफ, गुल्मदोषनाशक, कटु, उष्ण, कुष्ठ, फण्डति, शूलं महो (स० स्त्री० ) मयते इति-मह-मच् ( गौरादिम्याच। मौर उदरोगनाशक माना गया है। ( राजनि०)' ' पा ४१४१ ) इति डोप यदा महि-शादिकारादिति डोप । ' महिपोकन्द (सं० पु० ) एक प्रकारका फन्द जिसे भैंसाफंद १पृथ्यो । २ नदीविशेष। यह नदी मालयामें वहती भी कहते हैं। है। इसके अलका गुण सुस्सादु, यलकर, पित्तहर और . महिपोघृत ( सं० लो०) महिपी दुग्धोत्थ घृत, भैसका गुण माना जाता है। (राजनि०)२ गामी, गाय। ३ । घो। गुण-यायु और पित्तनाशक, शीतल, मधुर, गुय, हिन्लमोचिका, हुरहुर। ४ लोक । ५ मिट्टी - ६ भय- विएम्मी, बलकर। . काश, स्थान | 0 झुण्ड, समूह । ८ क्षेत्रका