पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३२९

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२८१ ___ महेन्द्र-महेन्द्रमहोदेव ( रघुदेव ) महेन्द्र-१ एक विख्यात पण्डित । घे न्यायसारदीपिका- महेन्द्रचाप ( स० पु०) महेन्द्रस्य चापः, । इन्द्रचाप, के प्रणेता जयसिंहफे गुरु थे। २ एक प्राचीन कवि ।। इन्द्रधनुष । महेन्द्र-१ चाहमानपंशीय नड़ लाके एक राजा। ये महेन्द्रतनया-मद्रास प्रदेशके महेन्द्र पर्वतसे निकली विप्रहपालके पुत्र थे। २ इस्तिफुण्डीफे एक राष्ट्रकूट हुई दो छोटी छोटी धाराए। इनमें से एक युदरसिंगी, राज । ३ एक कोशलाधिपति । ४ पुष्टपुरके राजा। मद्रास और जलन्त्रा तालुक होती हुई पर्वा नगरके पास पे दोनों हो गुप्तवंशीय विख्यात नरपति समुद्रगुप्तसे समुद्रमें जा गिरी है। दूसरी पा-किमेदो भूमिभागके परास्त हुए थे। ५ गुहादित्यवंशधर ग्वालियरकं दो मध्य बहती हुईवगधरा नदी में मिली है। पला-किमेदी राजे । नगर इस अन्तिम शाखाके किनारे अवस्थित है। महेन्द्र-यौद्ध सम्राट अशोकके पुत्र । ये अशोकराज- प्रतिष्ठित महायोधिसङ्घ द्वारा ईस्वीसन् २४१-के पूर्व योद्ध- | महेन्द्रत्य (स० लो० ) महेन्द्रस्य भायः त्य । इन्द्रफे भाय या शक्ति। धर्मका प्रचार करनेके लिये सिंहलमें भेजे गये थे। वहां हो घे करालकालके मुख पतित हुए। | महेन्द्रदेव-उत्कलराजवंशीय एक राजा, गीतादेवके पुल । महेन्द्र आचार्यकैलास सामुद्री नामक ज्योतिर्ग्रन्थके, इन्होंने राजमहेन्द्री नगर घसाया। रचयिता। | महेन्द्रनगरी ( स० स्त्री० ) महेन्द्रस्य नगरी। अमरावती । महेन्द्रकदली (म० स्त्री० ) महेन्द्रसम्भवा तद्वर्णा वा महेन्द्रनाथ-हास्याण चव्याखाके प्रणेता। फदली। फदलीभेद, एक प्रकारका फेला । इसका गुण महेन्द्रनारायण-यंगालके राढ़देशके एक राजा। इन्होंने पात, अगदर और पित्तरोगनाशक माना गया है। | अपने राज्यको सुदृढ़ करनेके लिये दुग बनाया था। महेन्द्रगिरि-मद्रास प्रदेशके गजाम जिलान्तर्गत पूर्व घाट महेन्द्रपाल-पालय'शीय गौड़के एक अधिपति । पर्वतका पक शृङ्ग। यह अक्षा० १८५८१० उ० तथा महेन्द्रपालदेव कन्नोजके एक महाराज, भोजदेव के पुत्र । देशा० ८४ २६४ पू० समुद्रपृष्ठसे ४६२३ फुट ऊंचे पर ये ६० सम्बत्में मौजूद थे। अवस्थित है। इस गिरिश्टङ्ग पर चार प्राचीन और महेन्द्रपाल निर्भयराज-पण्डितप्रवर राजशेखरके शिग्य षड़े बड़े शिवमन्दिरोंके टूटे फूटे खंडहर नजर आते है। और प्रतिपालक एक राजा। एक समय यह स्थान तीर्थक्षेत्र रूपमें गिना जाता था। यहांफे गोकर्यास्यामोका माहात्म्य गाङ्गेय राजाओंको महेन्द्रपुर-प्राचीन नगरभेद । शिलालिपिमें विशदरूपसे वर्णित है। महेन्द्रवर्मदेव-गंग गोय एक कलिंगके राजा। रामायण में भी इस पर्वतका उल्लेख आया है। महेन्द्रवाड़ी-मद्रास प्रदेश उत्तर अरकाट जिलान्तर्गत हनमान इस पर्वतको लांघ कर लड़ा गये थे। तिने एक प्राचीन नगर। यह यालासापेटसे ६ कोस पूर्व और घलोफे सामने इस पर्वतप्रान्तमें विचेनगुट्टी नगर गो- उत्तरमें अवस्थित है। यहां एक दिग्गीके किनारे प्राचीन पुरयुत सुन्दर मन्दिरसे परिशोभित है तथा पश्विम- दुर्गका ध्वंसावशेष देखा जाता है । कुराम्बरा यहां में त्रियांकुड़की ओर लण्डन-मिसनरी सोसाइटीका राज्य करते थे। दीवारमै घिरे हुए दुर्ग में एक छोटे प्राचीन आयास नगर-कोयल नगर स्थित है। पर्वत । मन्दिरका निदर्शन पाया गया है जो यौद या जैन फोर्ति पर फहवेकी खेती होनेसे जङ्गलका बहुत कुछ अंश काट जैसा प्रतीत होता है। दिया गया है। इससे यन्यविभाग प्रमशः शन्य हो गया | महेन्द्रमन्त्री ( स० पु०) महेन्द्रस्य मन्त्री । देवराजके है। सिंहलकी गिरि। मन्त्री, पृहस्पति। महेन्द्रगुप्त ( स० पु० ) एक राजाका नाम । महेन्द्रमल-नेपालके एक राजा । ये नरेन्द्रमहफे पुत्र थे। महेन्द्रचन्द्र-ग्यालियरके एक हिन्दू-राजा, माधवराजके नेपाश देनो। पुत्र। ये ९५८०में राजगद्दी पर बैठे थे। महेन्द्रमहोदेव (रघुदेव )-राजमहेन्ट्रीक एक नरपनि । Voi. XVII