पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३३४

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पंदवरी-मदेरण्ड राजकुमारफे सहचर यनमें इस तरहका लौहगढ़ देश वम्बई प्रदेश महेश्वरी धनिया मोघ (मोधेराशामा) कर चकित स्तम्मित हुए। जद ये इसका कारण हृदन दा और वीस गोघुमा, दश भीर पोस मदालिपा तथा के लिये चले, तो पियोंके अभिशापसे पत्थरको मूर्ति · दश और योस मण्डालिया आदि धोणियों विभक है। बन गये। राम-रानियोंने तथा उनको महबरियोंने चाहा । दश और योस गोघुमा तथा दश और योस पदालिया कि निता सजा कर सनोधर्म का पालन करें-फिन्तु स्वयं कच्छ मीर काठियावाड़ महेश्वरियों के साथ आदान प्रदान महेश्वर उन्हें इस मामसे रोका पोछे उन्हींको रुपासे उन करते हैं। मोधेरा (परान्दिनके अन्तर्गत) मगरम इनकी सय स्त्रियोंने अपने अपने पतिमुमका दर्शन किया। दूसरे कुलदेवी भवारिका देयीका मन्दिर मौजूद है। समो मतसे सतो रमणियों की प्रार्थनासे सती शिरोमणि तरहके मदेश्वरो इस तीक्षेत्र में बड़ी धमा-भनिसे देवी पार्यतो सन्तुष्ट हुई और उनके अनुरोधसे पूर्वोक्त शङ्कर- दर्शनफे लिये जाते है। ये घेश्य है और जनेऊ पारनेर, को सपा द्वारा पत्थरको मूर्ति मनुप्यरुपमै परिणत हुई. अधिकारी होने पर भी किसी मद्देश्वरीको जनेऊ धारण यो। महेश्यरको रुपासे पुनः जीवन पा कर इन लोगोंने करते नहीं देखा गया है। मद्देश्वर नामको विरस्थायी रम्बनेके लिये अपना नाम मएडालियाके सिवा मोघ मादि महेश्वरी पियाह मण्डालिया सिया माहेश्वरो या महेश्वरी रखा। इसी समय इस जाति। समय तलवार यांधते हैं। इनमें विघया विषाद ने शरफी आशासे अन त्याग वाणिज्यका कार्य प्रहण : सर्वथा निन्दनीय है। किन्तु यपियाहमें कोई बाधा किया। राजकुमारके माथ उनके ७२ सहचर पत्थर नहीं है। बन गये थे। इन्हीं ७२ भादमियों के नामोके अनुसार कलकत्तेफे मदेश्वरी नागर भार थर नगरको हो अपना इनका गोल चाल हुआ । राजा महेश्वरो-सम्प्रदायके भाट मादिस्थान मानते हैं । यल्लभसम्प्रदाययाले मध्यरी पैष्णय या जाग हुए। मतावलम्बी होने पर भी अपनी पुलदेवियोंको पूजा किया __उक्त यहत्तरों में इस समय अजमोढ़ी, औघड़, पहरी, { करते हैं। पालिवाल प्रामण हो इनफै फुलपुरोहित है। बलदुभा, भांगड़, बरियाल, येगी, भाएडारी, भूतड़ा, किन्तु इस समय कितने ही गोफणं प्राह्मणोंने मी बिहानी, विन्नाणी, चएडक, चेतलिगिया, डागा, दंभारो, इनका पौरोहित्य स्योकार कर लिया है। विवाहक दुरानो, धूत, हरिया, जगु, भरकत, फयर, कल्याणी, समय कुल वधुएं कन्यावरण आदि खो-आचार गहरे करता। कङ्कणी, कर्णाणो, सात, खोखता, सालिया, कोठारी, } । महेषु (सं० पु० ) महान् इषुः। १वमा तीर या पाण। लब्ध, लमोतिया, लोहिया, मल, मलपाणे, माल, मंत्री, (f.)२ महदिपुयुत, पपा धनुर्धारी । मरद, मरुधवान, मन्धुर, नाघरोन, निष्कलङ्क, पाणी, | मदे पुधि (स० वि०) महान् इधिः यस्य । धानुक, पुण्डपालिया, पर्याल, राठा, साय, सघर सौधानी, | धनुधारी। सिकची, सोमाणी, सोनी, तोपारिया, तोपालिपाल और महेप्यास (संपु०) धानुक, यह धनुर्धारी। । तोतल आदि नाम मिलते हैं। ये हिन्दू-यल्लम संप्रदायास स०५०) म देता। में अपनेको गिनाते हैं। गौड़ ग्रामण इनफे पौरोहित्य मसिया (दि. पु०) एक प्रकारका उपम ' अगदमी कार्य किया करते हैं। देविनों में इनकी बड़ी भक्ति है। धान । श्रीहायको समर्पित विना किये ये पान मी नदी मईकोइए (संयु.) पाच धाम, माय फोदिष्ट, पर पाते। धारो मरने बाद पहले पहल मशीच मा गत राजपूतानेके मद्देश्यरियों को वियाद-प्रथा स्वतन्त्र प्राणाम या जाता। प्रकारको है। यरफे कन्या गृह प्रवेश करने पर मदतरेय (सल0) येदिक विशेष, परेपउपनियु।। कन्या मामा कन्याको गोदमें ले कर यरको मात पार | | मरिएट ( स० पु. ) महामायेगव, पूल पर प्रदक्षिणा करेगा। एक प्रकारका बारे। इस दौर भी रहे होते हैं। 11.५